A Speech Only the Primal Know
बोली हमारी पूर्व की, हमें लखै नहिं कोय। हमको तो सोई लखै, जो धुर पूरब का होय॥
Kabir speaks of a mystical, primeval utterance — a truth as old as existence itself — that ordinary people simply cannot grasp. Only one who shares that same primordial origin, who has touched the same eternal source, can truly understand what he is saying; to everyone else, it remains a mystery.
आदि वाणी का रहस्य
बोली हमारी पूर्व की, हमें लखै नहिं कोय। हमको तो सोई लखै, जो धुर पूरब का होय॥
कबीर कहते हैं कि उनकी वाणी अनादि काल की, आत्मा के मूल स्रोत से उपजी है, इसलिए सामान्य जन उसे समझ नहीं पाते। उसे केवल वही समझ सकता है जो स्वयं उसी परम आदि तत्त्व से जुड़ा हो — यह वाणी बौद्धिक ज्ञान से नहीं, आत्मानुभव से ही समझी जा सकती है।
आदिवाणीचे रहस्य
बोली हमारी पूर्व की, हमें लखै नहिं कोय। हमको तो सोई लखै, जो धुर पूरब का होय॥
कबीर म्हणतात की त्यांची वाणी अनादी काळापासूनची, आत्म्याच्या मूळ उगमातून आलेली आहे, म्हणून सामान्य लोकांना ती समजत नाही. ती फक्त तोच समजू शकतो जो स्वतः त्याच परम आदितत्त्वाशी जोडलेला आहे — ही वाणी बुद्धीने नव्हे, आत्मानुभवानेच उमगते.