Beyond Bound and Boundless
हद चले सो मानवा, बेहद चले सो साध। हद बेहद दोऊ तजे, ताकर मता अगाध॥
One who lives within worldly limits is an ordinary person; one who transcends those limits is a saint. But one who lets go of both the bound and the boundless altogether — such a one's understanding is truly unfathomable.
हद और बेहद से परे
हद चले सो मानवा, बेहद चले सो साध। हद बेहद दोऊ तजे, ताकर मता अगाध॥
जो सीमाओं में बँधकर चले, वह मानव है; जो सीमाओं से परे चले, वह साधु है। पर जो हद और बेहद दोनों को त्याग दे, उसकी समझ अथाह है — यह सर्वोच्च आध्यात्मिक अवस्था का वर्णन है।
मर्यादा आणि अमर्यादेपलीकडे
हद चले सो मानवा, बेहद चले सो साध। हद बेहद दोऊ तजे, ताकर मता अगाध॥
जो मर्यादेत बांधून चालतो, तो सामान्य मानव; जो मर्यादेपलीकडे चालतो, तो साधू. पण जो मर्यादा आणि अमर्यादा दोन्ही सोडून देतो, त्याची समज अथांग असते — ही सर्वोच्च आध्यात्मिक अवस्था आहे.