Beyond the Reach of Words
शब्द-शब्द सब कोई कहैं, वो तो शब्द विदेह। जिभ्या पर आवै नहीं, निरखि परखि करि लेह॥
Every school of thought speaks endlessly of the Word as its object of worship and goal, but the true object of devotion is pure consciousness itself, entirely beyond the net of words; it cannot be captured on the tongue, only recognized and discerned within.
शब्दों से परे वह तत्व
शब्द-शब्द सब कोई कहैं, वो तो शब्द विदेह। जिभ्या पर आवै नहीं, निरखि परखि करि लेह॥
सब मतवादी केवल शब्द को ही अपना लक्ष्य बताते हैं, पर सच्चा उपास्य तो शब्दों के जाल से परे शुद्ध चेतना है। वह जीभ पर आने वाली चीज़ नहीं है, उसे तो केवल भीतर परख कर ही पहचाना जा सकता है।
शब्दांच्या पलीकडले तत्त्व
शब्द-शब्द सब कोई कहैं, वो तो शब्द विदेह। जिभ्या पर आवै नहीं, निरखि परखि करि लेह॥
सगळे मतवादी फक्त शब्दालाच आपले ध्येय मानतात, पण खरे उपास्य तर शब्दांच्या जाळ्यापलीकडील शुद्ध चैतन्य आहे. ती जिभेवर येणारी गोष्ट नाही, ती फक्त आतून पारखूनच ओळखता येते.