Burning Within, Unseen Without
हाड़ जरै जस लाकड़ी, बार जरै जस घास। कबिरा जरे रामरस, जस कोठी जरै कपास॥
When a body is cremated, the bones burn like wood and the hair like dry grass — an ordinary, visible fire. But Kabir says the soul devoted to the unseen Ram burns with a different fire, the inner pain of separation and longing, smoldering quietly within, like raw cotton catching fire inside a sealed storehouse, unseen from the outside.
भीतर की आग
हाड़ जरै जस लाकड़ी, बार जरै जस घास। कबिरा जरे रामरस, जस कोठी जरै कपास॥
मृत शरीर जलाने पर हड्डी लकड़ी की तरह और बाल घास की तरह जलते हैं — यह तो प्रत्यक्ष आग है। लेकिन कबीर कहते हैं कि जो जीव अगोचर राम की उपासना करता है, वह विरह-वेदना में उसी तरह भीतर-ही-भीतर जलता है जैसे कोठी में रखी कपास बिना बाहर पता चले सुलगती रहती है।
आतली आग
हाड़ जरै जस लाकड़ी, बार जरै जस घास। कबिरा जरे रामरस, जस कोठी जरै कपास॥
मृत शरीर जाळताना हाडे लाकडासारखी आणि केस गवतासारखी जळतात — ही तर उघड आग आहे. पण कबीर म्हणतात, जो जीव अदृश्य रामाची उपासना करतो, तो विरहवेदनेत आतल्याआत तसाच जळतो जसा कोठारात ठेवलेला कापूस बाहेर कळू न देता धुमसत राहतो.