Even Yogis Get Trapped
झिलमिल झगरा झूलते, बाकि छूटि न काहु। गोरख अटके कालपुर, कौन कहावै साहु॥
Kabir observes that yogis absorbed in the quarrel over the flickering inner light seen during their mystic practices remain caught in this illusion, and none escape it — not even the great Gorakhnath, who himself got trapped in this town of imagination. If such a master could not escape, Kabir asks, who else can claim to be truly wise?
गोरखनाथ भी न बच सके
झिलमिल झगरा झूलते, बाकि छूटि न काहु। गोरख अटके कालपुर, कौन कहावै साहु॥
प्राणायाम और योग-साधना में झिलमिल ज्योति के दर्शन को लेकर सभी योगी उलझे रहते हैं, इससे कोई नहीं बच पाया। स्वयं गोरखनाथ जैसे महापुरुष भी इस कल्पना के जाल में फँस गए, तो फिर दूसरा कौन इससे मुक्त होने का दावा कर सकता है।
गोरखनाथही सुटले नाहीत
झिलमिल झगरा झूलते, बाकि छूटि न काहु। गोरख अटके कालपुर, कौन कहावै साहु॥
प्राणायाम व योगसाधनेत दिसणाऱ्या झिलमिल ज्योतीच्या भ्रमात सर्व योगी अडकलेले असतात, यातून कोणीच सुटलेला नाही. खुद्द गोरखनाथांसारखे महापुरुषही या कल्पनेच्या जाळ्यात अडकले, मग दुसरा कोण स्वतःला मुक्त म्हणवेल.