Everywhere Fancy, Nowhere Truth
देश विदेश हौं फिरा, मनहीं भरा सुकाल। जाको ढूँढ़त हौं फिरा, ताका परा दुकाल॥
Kabir says he wandered through many lands and found everywhere an abundance of the mind's own imaginings and false beliefs flourishing freely. But the true seeker of truth he searched for was nowhere to be found -- a famine of genuine discernment prevails.
हर जगह कल्पना, सत्य का अभाव
देश विदेश हौं फिरा, मनहीं भरा सुकाल। जाको ढूँढ़त हौं फिरा, ताका परा दुकाल॥
कबीर कहते हैं, मैं देश-विदेश घूमा तो पाया कि हर जगह मन की कल्पनाओं और भ्रामक मान्यताओं की भरमार है, परंतु जिस सच्चे सत्य के पारखी को मैं खोजता रहा, वह कहीं नहीं मिला -- उसका सर्वत्र अभाव ही दिखा।
सर्वत्र कल्पना, सत्याचा अभाव
देश विदेश हौं फिरा, मनहीं भरा सुकाल। जाको ढूँढ़त हौं फिरा, ताका परा दुकाल॥
कबीर म्हणतात, मी देशोदेशी फिरलो तेव्हा दिसले की सर्वत्र मनाच्या कल्पना आणि भ्रामक समजुतींचा बोलबाला आहे, पण ज्या खऱ्या सत्याच्या पारख्याला मी शोधत होतो, तो कुठेच सापडला नाही.