Feet Cannot Stand in the Current
साखी कहै गहै नहीं, चाल चली नहिं जाय। सलिल धार नदिया बहै, पाँव कहाँ ठहराय॥
People recite words of wisdom and even declare themselves the witnessing soul, yet they never truly absorb this truth in their hearts nor live by it. Kabir compares this to trying to stand firm in a river's strong current -- when desire's force rages within, how can patience or steadiness hold its ground?
तेज धार में पाँव कहाँ टिके
साखी कहै गहै नहीं, चाल चली नहिं जाय। सलिल धार नदिया बहै, पाँव कहाँ ठहराय॥
लोग ज्ञान की बातें कहते हैं, स्वयं को साक्षी चेतन बताते हैं, पर उन बातों को हृदय में उतारकर आचरण में नहीं लाते। जैसे तेज बहती नदी में पैर नहीं टिकता, वैसे ही जब मन में वासनाओं का जोर हो तो वहां धैर्य कहाँ टिकेगा।
वेगवान प्रवाहात पाय कसा टिकेल
साखी कहै गहै नहीं, चाल चली नहिं जाय। सलिल धार नदिया बहै, पाँव कहाँ ठहराय॥
लोक ज्ञानाच्या गोष्टी बोलतात, स्वतःला साक्षी चैतन्य म्हणवतात, पण त्या गोष्टी हृदयात उतरवून आचरणात आणत नाहीत. जशी वेगवान नदीत पाय टिकत नाही, तसेच मनात वासनांचा जोर असेल तर तिथे धैर्य कसे टिकेल.