Many Disguises, Undispelled Delusion
कबीर भरम न भाजिया, बहुबिधि धरिया भेष। साँई के परचावते, अंतर रहि गइ रेष॥
Kabir observes that people adopt all sorts of religious disguises and sectarian garbs, yet their inner delusion is never truly dispelled. Even as guru and disciple go through the motions of introducing each other to God, some residue of worldly craving quietly remains within, unaddressed.
भेष बदला, भ्रम न मिटा
कबीर भरम न भाजिया, बहुबिधि धरिया भेष। साँई के परचावते, अंतर रहि गइ रेष॥
लोग विभिन्न सम्प्रदायों में तरह-तरह के भक्त और साधु वेष धारण कर लेते हैं और कर्मकांड-वाणी के जाल में उलझ जाते हैं, पर उनके मन का भ्रम नहीं मिटता। गुरु-शिष्य परस्पर ईश्वर से परिचय कराते हुए भी उलझन में ही रह जाते हैं, और मन में कहीं-न-कहीं संसार की वासना शेष रह जाती है।
वेष बदलला, भ्रम कायम
कबीर भरम न भाजिया, बहुबिधि धरिया भेष। साँई के परचावते, अंतर रहि गइ रेष॥
लोक निरनिराळ्या संप्रदायांत वेगवेगळे भक्त आणि साधूंचे वेष धारण करतात आणि कर्मकांड-शब्दजालात अडकतात, पण त्यांच्या मनातील भ्रम मिटत नाही. गुरू-शिष्य एकमेकांना ईश्वराची ओळख करून देतानाही गोंधळातच राहतात, आणि मनात कुठेतरी संसाराची वासना शिल्लक राहतेच.