Pride Undoes the Great
बड़े गये बड़ापने, रोम-रोम हंकार। सतगुरु के परचै बिना, चारों बरन चमार॥
Many who called themselves great fell low, drowning in the intoxication of false pride that filled every pore of their being. Without the true self-knowledge that comes from a genuine guru, people of all classes remain bound to the skin and flesh of the body, blind to anything beyond it.
अहंकार से पतन
बड़े गये बड़ापने, रोम-रोम हंकार। सतगुरु के परचै बिना, चारों बरन चमार॥
कितने बड़े कहलाने वाले लोग अपने ही मिथ्या अहंकार में डूबकर गिर गए। सद्गुरु से स्वरूप-ज्ञान पाए बिना, चाहे कोई किसी भी वर्ण का हो, उसकी बुद्धि देह तक ही सीमित रहती है — यही असली दरिद्रता है।
अहंकारामुळे पतन
बड़े गये बड़ापने, रोम-रोम हंकार। सतगुरु के परचै बिना, चारों बरन चमार॥
स्वतःला मोठे म्हणवणारे कित्येक लोक खोट्या अहंकाराच्या नशेत बुडून खाली पडले. सद्गुरूकडून स्वरूपज्ञान मिळाल्याशिवाय, मग तो कोणत्याही वर्णाचा असो, त्याची बुद्धी फक्त देहापुरतीच मर्यादित राहते — हीच खरी उणीव आहे.