The Blind Leading the Blind
जाना नहीं बूझा नहीं, समुझि किया नहिं गौन। अंधे को अंधा मिला, राह बतावै कौन॥
Kabir describes a traveler who sets out without knowing the way and without asking anyone who does — and worse, meets only another blind man on the road, who can show him no path at all. In the same way, one who seeks truth without humbly turning to a true guru wanders blindly, since two who lack understanding cannot lead each other anywhere.
अंधे को अंधा मिला
जाना नहीं बूझा नहीं, समुझि किया नहिं गौन। अंधे को अंधा मिला, राह बतावै कौन॥
जो व्यक्ति बिना समझे-बूझे और बिना किसी जानकार से पूछे यात्रा पर निकल पड़े, वह अंधे के समान है; और यदि उसे राह में कोई और अंधा मिल जाए तो सही राह कौन बताएगा? इसी तरह जो सच्चे सद्गुरु की शरण लिए बिना परमार्थ के मार्ग पर चल पड़ता है, वह भटकता ही रहता है।
आंधळ्याला आंधळा भेटला
जाना नहीं बूझा नहीं, समुझि किया नहिं गौन। अंधे को अंधा मिला, राह बतावै कौन॥
जो माणूस समजून-उमजून न घेता आणि कुणाला न विचारता प्रवासाला निघतो, तो आंधळ्यासारखा असतो; आणि वाटेत त्याला दुसरा आंधळाच भेटला तर योग्य वाट कोण दाखवणार? त्याचप्रमाणे खऱ्या सद्गुरूचा आश्रय न घेता परमार्थाच्या मार्गावर चालणारा माणूस भरकटतच राहतो.