The Dog in the Mirrored Palace
ज्यों मोदाद समसान शिल, सबै रूप समसान। कहहिं कबीर वह सावज की गति, तबकी देखि भुकान॥
Just as a clear crystal stone takes on whatever color falls upon it, the human mind absorbs whatever mood or tendency it encounters and is shaped by it. Kabir compares this to a dog in a hall of mirrors, barking itself to death at its own reflections mistaken for rivals -- likewise, a deluded person projects his own feelings onto the world and destroys himself in cycles of attachment and hatred.
शीशमहल में भौंकता कुत्ता
ज्यों मोदाद समसान शिल, सबै रूप समसान। कहहिं कबीर वह सावज की गति, तबकी देखि भुकान॥
जैसे स्फटिक पत्थर जिस रंग के पास रखा जाए वैसा ही दिखने लगता है, वैसे ही मनुष्य का मन जिन वृत्तियों के संपर्क में आता है उन्हीं के रंग में रंग जाता है। कबीर कहते हैं, जैसे कुत्ता शीशमहल में अपने ही प्रतिबिंबों को शत्रु मानकर भौंक-भौंककर मर जाता है, वैसे ही भ्रमित मनुष्य अपनी ही भावनाओं को सब में देखकर राग-द्वेष में उलझकर नष्ट हो जाता है।
आरशांच्या महालातील भुंकणारा कुत्रा
ज्यों मोदाद समसान शिल, सबै रूप समसान। कहहिं कबीर वह सावज की गति, तबकी देखि भुकान॥
जसा स्फटिक दगड ज्या रंगाजवळ ठेवला जातो तसाच दिसू लागतो, तसेच माणसाचे मन ज्या वृत्तींच्या संपर्कात येते त्याच रंगात रंगते. कबीर म्हणतात, जसा कुत्रा आरशांच्या महालात स्वतःच्याच प्रतिबिंबांना शत्रू मानून भुंकत भुंकत मरतो, तसाच भ्रमित माणूस स्वतःच्याच भावना सर्वत्र पाहून राग-द्वेषात अडकून नष्ट होतो.