The Guru's Arrow of Love
सतगुर लई कमांण करि, बांहण लागा तीर॥ एक जु बाह्या प्रीति सूं, भीतरि रह्या सरीर॥
Kabir describes his Guru as an archer who took up a bow and began to shoot arrows. One arrow, shot with pure love, struck him and lodged itself deep within his body, piercing his heart forever with the truth of the Guru's teaching.
गुरु का प्रेम-बाण
सतगुर लई कमांण करि, बांहण लागा तीर॥ एक जु बाह्या प्रीति सूं, भीतरि रह्या सरीर॥
कबीर कहते हैं, सतगुरु ने मानो धनुष उठाकर बाण चलाने शुरू किए। एक बाण उन्होंने प्रेम से चलाया, जो शरीर के भीतर ही समा गया — यह गुरु के ज्ञान-प्रेम का गहरा, स्थायी प्रभाव दर्शाता है।
गुरूचा प्रेम-बाण
सतगुर लई कमांण करि, बांहण लागा तीर॥ एक जु बाह्या प्रीति सूं, भीतरि रह्या सरीर॥
कबीर म्हणतात, सद्गुरूने जणू धनुष्य उचलून बाण सोडायला सुरुवात केली. एक बाण त्यांनी प्रेमाने सोडला, जो शरीरातच खोलवर रुतून बसला — हे गुरूच्या ज्ञान-प्रेमाचा खोल, कायमचा प्रभाव दर्शवते.