The Mirror and Its Image
ज्यों दर्पण प्रतिबिंब देखिये,आपु दुहुँनमा सोय। यह तत्व से वह तत्व है, याही से वह होय॥
Just as a person sees their own reflection in a mirror, the same self exists in both the original form and its reflected image, one arising from the other. In the same way, our inner beliefs shape and become the outer reality we experience.
दर्पण और प्रतिबिंब की एकता
ज्यों दर्पण प्रतिबिंब देखिये,आपु दुहुँनमा सोय। यह तत्व से वह तत्व है, याही से वह होय॥
जैसे मनुष्य दर्पण में अपना ही प्रतिबिंब देखता है, मूल शरीर और उसकी छाया दोनों में एक ही सत्ता होती है — प्रतिबिंब मूल तत्व से ही बनता है। उसी तरह जैसी हमारी मान्यता होती है, वैसी ही हमारी भावना और अनुभव बन जाते हैं।
आरसा आणि प्रतिबिंबाचे ऐक्य
ज्यों दर्पण प्रतिबिंब देखिये,आपु दुहुँनमा सोय। यह तत्व से वह तत्व है, याही से वह होय॥
जसे माणूस आरशात स्वतःचेच प्रतिबिंब पाहतो, मूळ शरीर आणि त्याची छाया दोन्हींत एकच अस्तित्व असते — प्रतिबिंब मूळ तत्त्वातूनच बनते. त्याचप्रमाणे जशी आपली धारणा असते, तसाच आपला अनुभव आणि भावना घडते.