The Wandering Mind at Prayer
माला तो कर में फिरै, जीभि फिरै मुख माँहि। मनुवाँ तो दहुँ दिसि फिरै, यह तौ सुमिरन नाहिं।
The rosary turns in the hand, the tongue moves in the mouth reciting — but if the mind wanders in every direction, this is not true remembrance at all.
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भटकते मन का जाप
माला तो कर में फिरै, जीभि फिरै मुख माँहि। मनुवाँ तो दहुँ दिसि फिरै, यह तौ सुमिरन नाहिं।
माला हाथ में घूमती है, जीभ मुख में जपती है, पर मन दसों दिशाओं में भटकता रहे — तो यह सच्चा सुमिरन नहीं है। बाहरी क्रिया नहीं, भीतरी एकाग्रता ही असली भक्ति है।
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भरकटलेल्या मनाचा जप
माला तो कर में फिरै, जीभि फिरै मुख माँहि। मनुवाँ तो दहुँ दिसि फिरै, यह तौ सुमिरन नाहिं।
माळ हातात फिरते, जीभ तोंडात जप करते, पण मन दाही दिशांना भरकटत राहते — तर हे खरे सुमिरन नाही. बाह्य क्रिया नव्हे, आतील एकाग्रताच खरी भक्ती आहे.
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