When Eating Is Not Prasad
आहार करे मन भावता, इंदी किए स्वाद। नाक तलक पूरन भरे, तो का कहिए प्रसाद॥
If one eats only what the mind fancies, indulging every sense of taste, filling the stomach right up to the nose — how then can that be called sacred prasad? True nourishment requires restraint and mindfulness.
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यह प्रसाद कैसे कहलाए?
आहार करे मन भावता, इंदी किए स्वाद। नाक तलक पूरन भरे, तो का कहिए प्रसाद॥
जो मन को भाए वही खाए, इंद्रियों का स्वाद भोगे, नाक तक पेट भर ले — तो इसे प्रसाद कैसे कहा जाए? सच्चा प्रसाद संयम और सजगता से ग्रहण किया जाता है, भोग-लोलुपता से नहीं।
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हा प्रसाद कसा म्हणावा?
आहार करे मन भावता, इंदी किए स्वाद। नाक तलक पूरन भरे, तो का कहिए प्रसाद॥
मनाला भावेल तेच खावे, इंद्रियांची चव भोगावी, नाकापर्यंत पोट भरावे — मग याला प्रसाद कसे म्हणावे? खरा प्रसाद संयम आणि सजगतेने ग्रहण केला जातो, चंगळखोरीने नव्हे.
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