The Eye of Wisdom Alone Sees
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् । विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुष: ॥ 10॥
The deluded do not perceive the soul as it departs the body, abides in it, or experiences the gunas while enjoying them; but those endowed with the eye of knowledge do perceive it.
ज्ञान-चक्षु से ही दर्शन
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् । विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुष: ॥ 10॥
मूढ़ लोग शरीर से निकलते हुए, उसमें स्थित रहते हुए, या गुणों को भोगते हुए आत्मा को नहीं देख पाते; परंतु ज्ञान-चक्षु से संपन्न लोग उसे देख लेते हैं।
ज्ञानचक्षूनेच दर्शन
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् । विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुष: ॥ 10॥
मूढ लोक शरीरातून निघून जाणाऱ्या, त्यात स्थित असणाऱ्या किंवा गुणांचा उपभोग घेणाऱ्या आत्म्याला पाहू शकत नाहीत; परंतु ज्ञानचक्षू असलेले लोक त्याला पाहू शकतात.