Surrendering All Actions to the Divine
चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्पर: । बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्त: सततं भव ॥ 57॥
Mentally surrendering all your actions to Me, regarding Me as the Supreme goal, and taking refuge in the yoga of discrimination, keep your mind ever fixed on Me.
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सब कर्मों का समर्पण
चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्पर: । बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्त: सततं भव ॥ 57॥
मन से सभी कर्मों को मुझमें अर्पित करके, मुझे परम लक्ष्य मानकर और बुद्धियोग का आश्रय लेकर, सदैव मुझमें ही चित्त लगाए रखो।
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सर्व कर्मांचे समर्पण
चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्पर: । बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्त: सततं भव ॥ 57॥
मनाने सर्व कर्मे माझ्यात अर्पण करून, मला परम ध्येय मानून आणि बुद्धियोगाचा आश्रय घेऊन, सदैव माझ्यातच चित्त स्थिर ठेवा.
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