The Cosmic Cycle of Creation
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् । कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥ 7॥ प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुन: पुन: । भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥ 8॥
All beings, O Kaunteya, merge into My own nature at the end of a cosmic cycle, and I send them forth again at the beginning of the next. Presiding over My own nature, I create again and again this entire multitude of beings, who are helpless, being under the sway of nature's forces.
सृष्टि की पुनरावृत्ति
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् । कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥ 7॥ प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुन: पुन: । भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥ 8॥
हे कौन्तेय, कल्प के अंत में सभी प्राणी मेरी प्रकृति में लीन हो जाते हैं और कल्प के आरंभ में मैं उन्हें पुनः रचता हूँ। अपनी प्रकृति को अधीन रखते हुए, प्रकृति के वश में असमर्थ इस समस्त प्राणिसमूह को मैं बार-बार रचता हूँ।
सृष्टीची पुनरावृत्ती
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् । कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥ 7॥ प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुन: पुन: । भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥ 8॥
हे कौंतेया, कल्पाच्या अंती सर्व प्राणी माझ्या प्रकृतीत विलीन होतात आणि कल्पाच्या आरंभी मी त्यांना पुन्हा निर्माण करतो. स्वतःच्या प्रकृतीवर अधिराज्य ठेवत, प्रकृतीच्या अधीन असलेल्या या संपूर्ण प्राणिसमूहाला मी वारंवार निर्माण करतो.