Choose Whom You Serve Wisely
सेवकः स्वामिनं द्वेष्टि कृपणं परुषाक्षरम् आत्मानं किं स न द्वेष्टि सेव्यासेव्यं न वेत्ति यः
A servant resents a master who is stingy and harsh-spoken, but shouldn't he really resent himself instead, for not having the wisdom to judge whom he ought to serve and whom he shouldn't? Before blaming the people or situations we're stuck with, we should ask why we chose them in the first place.
किसकी सेवा करें, यह समझें
सेवकः स्वामिनं द्वेष्टि कृपणं परुषाक्षरम् आत्मानं किं स न द्वेष्टि सेव्यासेव्यं न वेत्ति यः
एक सेवक कंजूस और कड़वे स्वभाव वाले स्वामी से नफ़रत करता है, पर क्या उसे स्वयं से नफ़रत नहीं होनी चाहिए कि उसे यह समझ ही नहीं आया कि किसकी सेवा करनी चाहिए और किसकी नहीं? दूसरों को दोष देने से पहले यह सोचना चाहिए कि हमने उन्हें चुना ही क्यों।
कोणाची सेवा करावी हे समजा
सेवकः स्वामिनं द्वेष्टि कृपणं परुषाक्षरम् आत्मानं किं स न द्वेष्टि सेव्यासेव्यं न वेत्ति यः
एक सेवक कंजूष आणि कठोर बोलणाऱ्या मालकाचा द्वेष करतो, पण त्याने स्वतःचाच द्वेष करायला नको का, कारण त्याला हेच समजले नाही की कोणाची सेवा करावी आणि कोणाची करू नये? दुसऱ्यांना दोष देण्याआधी आपण त्यांची निवड का केली, याचा विचार करायला हवा.