Enough Is Enough
यावत् भ्रियेत जठरं तावत् सत्वं हि देहीनाम् । अधिकं योभिमन्येत स स्तेनो दण्डमर्हति ॥
A person's rightful share is only what fills the stomach — no more. Anyone who claims more than that out of greed is no different from a thief, and deserves to be punished.
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आवश्यकता ही अधिकार है
यावत् भ्रियेत जठरं तावत् सत्वं हि देहीनाम् । अधिकं योभिमन्येत स स्तेनो दण्डमर्हति ॥
प्राणी का वास्तविक अधिकार केवल उतना ही है जितने से पेट भर सके। जो इससे अधिक की लालसा रखता है, वह चोर के समान है और दंड का पात्र है।
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गरजेपुरतेच खरे हक्क
यावत् भ्रियेत जठरं तावत् सत्वं हि देहीनाम् । अधिकं योभिमन्येत स स्तेनो दण्डमर्हति ॥
प्राण्याचा खरा हक्क फक्त पोट भरण्यापुरताच असतो. जो त्यापेक्षा जास्तीचा लोभ धरतो, तो चोरासारखाच असून शिक्षेस पात्र ठरतो.
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