Kinship Over a Stranger's Virtue
गुणवान् वा परजनः स्वजनो निर्गुणोऽपि वा निर्गुणः स्वजनः श्रेयान् यः परः पर एव च
Whether a stranger is virtuous or one's own kin lacks virtue, a kinsman without virtue is still preferable — for a stranger, however accomplished, remains only a stranger.
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अपना, चाहे निर्गुण हो
गुणवान् वा परजनः स्वजनो निर्गुणोऽपि वा निर्गुणः स्वजनः श्रेयान् यः परः पर एव च
चाहे पराया व्यक्ति गुणवान हो या अपना व्यक्ति निर्गुण, फिर भी निर्गुण अपना व्यक्ति श्रेष्ठ है, क्योंकि पराया चाहे कितना भी गुणी क्यों न हो, पराया ही रहता है।
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आपला, गुण नसला तरी
गुणवान् वा परजनः स्वजनो निर्गुणोऽपि वा निर्गुणः स्वजनः श्रेयान् यः परः पर एव च
परका माणूस गुणी असो वा आपला माणूस निर्गुणी असो, तरीही निर्गुणी आपला माणूस अधिक जवळचा असतो; कारण परका कितीही गुणी असला तरी परकाच राहतो.
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