Taste, the Last Frontier
तावज्जितेन्द्रियो न स्याद् विजितान्येन्द्रियः पुमान् । न जयेद् रसनं यावद् जितं सर्वं जिते रसे ॥
A person cannot be called truly self-controlled just for mastering the other senses, so long as the tongue remains unconquered; but once one masters the craving for taste, everything else falls into place.
रसना पर विजय
तावज्जितेन्द्रियो न स्याद् विजितान्येन्द्रियः पुमान् । न जयेद् रसनं यावद् जितं सर्वं जिते रसे ॥
अन्य सभी इंद्रियों को जीत लेने पर भी मनुष्य को तब तक पूर्ण जितेन्द्रिय नहीं कहा जा सकता जब तक उसने अपनी जीभ यानी स्वाद की लालसा को न जीता हो; रस को जीत लेने पर सब कुछ स्वतः जीत लिया जाता है।
जिभेवर विजय
तावज्जितेन्द्रियो न स्याद् विजितान्येन्द्रियः पुमान् । न जयेद् रसनं यावद् जितं सर्वं जिते रसे ॥
इतर सर्व इंद्रिये जिंकूनही, जोपर्यंत माणूस जिभेची म्हणजे चवीची लालसा जिंकत नाही, तोपर्यंत त्याला खरा जितेंद्रिय म्हणता येत नाही; चव जिंकली की बाकी सर्व आपोआप जिंकले जाते.