Wealth's Bitter Irony
यदर्जितं प्राणहरैः परिश्रमैः मृतस्य तद् वै विभजन्ति रिक्थिनः । कृतं च यद् दुष्कृतमर्थलिप्सया तदेव दोषापहतस्य कौतुकम् ॥
The wealth a man earns through backbreaking, life-draining toil is, after his death, divided up and enjoyed by his heirs, but the sins he committed out of greed to earn it remain entirely his own — a strange and bitter irony indeed.
धन का विडंबनापूर्ण सत्य
यदर्जितं प्राणहरैः परिश्रमैः मृतस्य तद् वै विभजन्ति रिक्थिनः । कृतं च यद् दुष्कृतमर्थलिप्सया तदेव दोषापहतस्य कौतुकम् ॥
मनुष्य जो धन प्राणों को घोंट देने वाले परिश्रम से कमाता है, उसके मरने के बाद उसके उत्तराधिकारी उसे बाँट लेते हैं, पर उस धन को कमाने के लोभ में किए गए पाप उसी को अकेले भुगतने पड़ते हैं — यह कैसी विचित्र विडंबना है!
धनाचा विरोधाभास
यदर्जितं प्राणहरैः परिश्रमैः मृतस्य तद् वै विभजन्ति रिक्थिनः । कृतं च यद् दुष्कृतमर्थलिप्सया तदेव दोषापहतस्य कौतुकम् ॥
माणूस जो पैसा जीव कंठाशी आणणाऱ्या कष्टांनी कमावतो, तो मृत्यूनंतर त्याचे वारसदार वाटून घेतात, पण तो पैसा कमावताना लोभापोटी केलेली पापे मात्र त्यालाच एकट्याला भोगावी लागतात — किती विचित्र विरोधाभास आहे हा!