When Dharma Was Enough
न राज्यं न राजाऽऽसीत् न दण्डयो न च दाण्डिकः । धर्मेणैव प्रजास्सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परम् ॥
In an earlier age, there was no kingdom, no king, no punishment, and no punisher — people protected one another simply through their own sense of dharma. It envisions a golden ideal where inner righteousness, not external law, was enough to keep society just.
जब धर्म ही पर्याप्त था
न राज्यं न राजाऽऽसीत् न दण्डयो न च दाण्डिकः । धर्मेणैव प्रजास्सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परम् ॥
उस स्वर्णिम युग में न कोई राज्य था, न राजा, न दंड और न दंड देने वाला—लोग केवल धर्म के बल पर ही एक-दूसरे की रक्षा करते थे। यह उस आदर्श कल्पना को दर्शाता है जहाँ बाहरी कानून नहीं बल्कि भीतरी सदाचार ही समाज को न्यायपूर्ण बनाए रखता था।
जेव्हा धर्मच पुरेसा होता
न राज्यं न राजाऽऽसीत् न दण्डयो न च दाण्डिकः । धर्मेणैव प्रजास्सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परम् ॥
त्या सुवर्णयुगात ना राज्य होते, ना राजा, ना दंड, ना दंड देणारा—लोक केवळ धर्माच्या बळावरच एकमेकांचे रक्षण करत असत. हे त्या आदर्श कल्पनेला दर्शवते जिथे बाह्य कायदा नव्हे, तर आंतरिक सदाचारच समाजाला न्याय्य ठेवत असे.