From the World to the Syllable Om
त्रयो धर्मस्कन्धा यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमस्तप एव द्वितीयो ब्रह्मचार्याचार्यकुलवासी तृतीयोऽत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन्सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति ॥ १ ॥ प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयी विद्या सम्प्रास्रवत्तामभ्यतपत्तस्या अभितप्ताया एतान्यक्षराणि सम्प्रास्र्वन्त भूर्भुवः स्वरिति ॥ २ ॥ तान्यभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्य ॐकारः सम्प्रास्रवत्तद्यथा शङ्कुना सर्वाणि पर्णानि संतृण्णान्येवमोंकारेण सर्वा वाक्संतृण्णोंकार एवेदं सर्वमोंकार एवेदं सर्वम् ॥ ३ ॥
There are three branches of duty. Sacrifice, study of the scriptures, and charity - that is the first. Austerity alone is the second. Living as a celibate student in the house of one's teacher, devoting oneself there entirely - that is the third. All of these attain the worlds of the virtuous, but the one who stands firmly established in the ultimate reality (Brahman) attains immortality. Prajapati brooded upon the worlds; from these worlds, thus brooded upon, the threefold Vedic knowledge flowed forth. He brooded upon that threefold knowledge; from it, thus brooded upon, these syllables flowed forth: Bhur, Bhuvah, Svah. He brooded upon these; from them, thus brooded upon, the syllable Om flowed forth. Just as all leaves are held together by their stalk, so all speech is held together by the syllable Om. Om, indeed, is all this - Om, indeed, is all this.
From the World to the Syllable Om
त्रयो धर्मस्कन्धा यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमस्तप एव द्वितीयो ब्रह्मचार्याचार्यकुलवासी तृतीयोऽत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन्सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति ॥ १ ॥ प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयी विद्या सम्प्रास्रवत्तामभ्यतपत्तस्या अभितप्ताया एतान्यक्षराणि सम्प्रास्र्वन्त भूर्भुवः स्वरिति ॥ २ ॥ तान्यभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्य ॐकारः सम्प्रास्रवत्तद्यथा शङ्कुना सर्वाणि पर्णानि संतृण्णान्येवमोंकारेण सर्वा वाक्संतृण्णोंकार एवेदं सर्वमोंकार एवेदं सर्वम् ॥ ३ ॥
धर्म की तीन शाखाएँ हैं - यज्ञ, अध्ययन और दान, यह प्रथम है। तप ही द्वितीय है। आचार्य के कुल में ब्रह्मचारी बनकर रहना, वहाँ अपने को पूर्णतः समर्पित करना, यह तृतीय है। ये सभी पुण्यलोकों को प्राप्त करते हैं, परन्तु जो ब्रह्म में सुस्थिर है, वही अमरत्व को प्राप्त करता है। प्रजापति ने लोकों का ध्यान किया; इन ध्यान किए गए लोकों से त्रयी विद्या प्रवाहित हुई। उन्होंने उस त्रयी विद्या का ध्यान किया; उससे ये अक्षर प्रवाहित हुए - भूः, भुवः, स्वः। उन्होंने इनका ध्यान किया; इनसे ॐ अक्षर प्रवाहित हुआ। जैसे सभी पत्ते डण्ठल से जुड़े रहते हैं, वैसे ही सम्पूर्ण वाणी ॐ अक्षर से जुड़ी है। ॐ ही यह सब कुछ है - ॐ ही यह सब कुछ है।
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त्रयो धर्मस्कन्धा यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमस्तप एव द्वितीयो ब्रह्मचार्याचार्यकुलवासी तृतीयोऽत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन्सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति ॥ १ ॥ प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयी विद्या सम्प्रास्रवत्तामभ्यतपत्तस्या अभितप्ताया एतान्यक्षराणि सम्प्रास्र्वन्त भूर्भुवः स्वरिति ॥ २ ॥ तान्यभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्य ॐकारः सम्प्रास्रवत्तद्यथा शङ्कुना सर्वाणि पर्णानि संतृण्णान्येवमोंकारेण सर्वा वाक्संतृण्णोंकार एवेदं सर्वमोंकार एवेदं सर्वम् ॥ ३ ॥
धर्माच्या तीन शाखा आहेत - यज्ञ, अध्ययन आणि दान, ही पहिली आहे. तप हीच दुसरी आहे. आचार्यांच्या कुळात ब्रह्मचारी बनून राहणे, तिथे स्वतःला पूर्णपणे समर्पित करणे, ही तिसरी आहे. या सर्व पुण्यलोक प्राप्त करतात, परंतु जो ब्रह्मात स्थिर आहे, तोच अमरत्व प्राप्त करतो. प्रजापतीने लोकांचे ध्यान केले; या ध्यान केलेल्या लोकांतून त्रयी विद्या प्रवाहित झाली. त्याने त्या त्रयी विद्येचे ध्यान केले; त्यातून ही अक्षरे प्रवाहित झाली - भूः, भुवः, स्वः. त्याने यांचे ध्यान केले; यांतून ॐ हे अक्षर प्रवाहित झाले. जसे सर्व पाने देठाला जोडलेली असतात, तशीच संपूर्ण वाणी ॐ अक्षराला जोडलेली आहे. ॐ हेच हे सर्व काही आहे - ॐ हेच हे सर्व काही आहे.