Om Is the Udgitha Itself
अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथ इत्यसौ वा आदित्य उद्गीथ एष प्रणव ओमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥ १ ॥ एतमु एवाहमभ्यगासिषं तस्मान्मम त्वमेकोऽसीति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच रश्मींस्त्वं पर्यावर्तयाद्बहवो वै ते भविष्यन्तीत्यधिदैवतम् ॥ २ ॥ अथाध्यात्मं य एवायं मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासीतोमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥ ३ ॥ एतमु एवाहमभ्यगासिषं तस्मान्मम त्वमेकोऽसीति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच प्राणांस्त्वं भूमानमभिगायताद्बहवो वै मे भविष्यन्तीति ॥ ४ ॥ अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथ इति होतृषदनाद्धैवापि दुरुद्गीथमनुसमाहरतीत्यनुसमाहरतीति ॥ ५ ॥
Whatever is the Udgitha is the sacred syllable Om, and whatever is that syllable is the Udgitha. Yonder sun is the Udgitha, and it is that syllable, for it moves on, sounding 'om'. 'It is to this alone that I sang praise,' Kaushitaki said to his son, 'therefore you alone are mine. Turn its rays toward yourself, and you will have many descendants' - so much for the cosmic aspect. Now for the individual self: one should meditate on the chief breath within the mouth as the Udgitha, for it too moves on, sounding 'om'. 'It is to this alone that I sang praise,' Kaushitaki said to his son, 'therefore you alone are mine. Sing praise to the breaths as the vast, boundless one, and you will have many descendants.' Thus, whatever is the Udgitha is that syllable, and whatever is that syllable is the Udgitha; and so, from the seat of the Hotr priest, if a mistake is made in the Udgitha, it may be corrected by returning to that syllable, again and again.
Om Is the Udgitha Itself
अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथ इत्यसौ वा आदित्य उद्गीथ एष प्रणव ओमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥ १ ॥ एतमु एवाहमभ्यगासिषं तस्मान्मम त्वमेकोऽसीति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच रश्मींस्त्वं पर्यावर्तयाद्बहवो वै ते भविष्यन्तीत्यधिदैवतम् ॥ २ ॥ अथाध्यात्मं य एवायं मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासीतोमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥ ३ ॥ एतमु एवाहमभ्यगासिषं तस्मान्मम त्वमेकोऽसीति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच प्राणांस्त्वं भूमानमभिगायताद्बहवो वै मे भविष्यन्तीति ॥ ४ ॥ अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथ इति होतृषदनाद्धैवापि दुरुद्गीथमनुसमाहरतीत्यनुसमाहरतीति ॥ ५ ॥
जो कुछ उद्गीथ है, वही ॐ अक्षर है, और जो कुछ वह अक्षर है, वही उद्गीथ है। वह सूर्य ही उद्गीथ है, और वही वह अक्षर है, क्योंकि वह चलते हुए 'ॐ' का उच्चार करता चलता है। कौषीतकि ने अपने पुत्र से कहा, 'मैंने इसी की स्तुति गाई है, इसलिए तू ही मेरा है। इसकी किरणों को अपनी ओर फेर, तब तेरी सन्तान बहुत होगी' - यह हुई अधिदैवत व्याख्या। अब अध्यात्म - मुख के भीतर के मुख्य प्राण को उद्गीथ मानकर उपासना करनी चाहिए, क्योंकि वह भी चलते हुए 'ॐ' का उच्चार करता है। कौषीतकि ने अपने पुत्र से कहा, 'मैंने इसी की स्तुति गाई है, इसलिए तू ही मेरा है। प्राणों की महान्, असीम रूप में स्तुति गा, तब तेरी सन्तान बहुत होगी।' इस प्रकार जो कुछ उद्गीथ है, वही वह अक्षर है, और जो कुछ वह अक्षर है, वही उद्गीथ है; इसीलिए होता के आसन से, यदि उद्गीथ में कोई त्रुटि हो जाए, तो उसे बार-बार उस अक्षर की ओर लौटकर ठीक किया जा सकता है।
Om Is the Udgitha Itself
अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथ इत्यसौ वा आदित्य उद्गीथ एष प्रणव ओमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥ १ ॥ एतमु एवाहमभ्यगासिषं तस्मान्मम त्वमेकोऽसीति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच रश्मींस्त्वं पर्यावर्तयाद्बहवो वै ते भविष्यन्तीत्यधिदैवतम् ॥ २ ॥ अथाध्यात्मं य एवायं मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासीतोमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥ ३ ॥ एतमु एवाहमभ्यगासिषं तस्मान्मम त्वमेकोऽसीति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच प्राणांस्त्वं भूमानमभिगायताद्बहवो वै मे भविष्यन्तीति ॥ ४ ॥ अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथ इति होतृषदनाद्धैवापि दुरुद्गीथमनुसमाहरतीत्यनुसमाहरतीति ॥ ५ ॥
जे काही उद्गीथ आहे, तेच ॐ अक्षर आहे, आणि जे काही ते अक्षर आहे, तेच उद्गीथ आहे. तो सूर्यच उद्गीथ आहे, आणि तोच ते अक्षर आहे, कारण तो चालताना 'ॐ' चा उच्चार करत जातो. कौषीतकीने आपल्या पुत्राला सांगितले, 'मी यालाच स्तुती गायली आहे, म्हणून तूच माझा आहेस. याची किरणे स्वतःकडे वळव, मग तुला भरपूर संतती होईल' - ही झाली अधिदैवत व्याख्या. आता अध्यात्म - मुखातील मुख्य प्राणाला उद्गीथ मानून उपासना करावी, कारण तोही चालताना 'ॐ' चा उच्चार करतो. कौषीतकीने आपल्या पुत्राला सांगितले, 'मी यालाच स्तुती गायली आहे, म्हणून तूच माझा आहेस. प्राणांची महान, अमर्याद रूपात स्तुती गा, मग तुला भरपूर संतती होईल.' अशा प्रकारे जे काही उद्गीथ आहे, तेच ते अक्षर आहे, आणि जे काही ते अक्षर आहे, तेच उद्गीथ आहे; म्हणूनच होत्याच्या आसनावरून, उद्गीथात काही चूक झाली, तर ती पुन्हा त्या अक्षराकडे वळून सुधारता येते.