The Contest of the Vital Powers
॥ इति चतुर्थोऽध्यायः ॥ ॥ पञ्चमोऽध्यायः ॥ यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च ह वै श्रेष्ठश्च भवति प्राणो वाव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च ॥ १ ॥ यो ह वै वसिष्ठं वेद वसिष्ठो ह स्वानां भवति वाग्वाव वसिष्ठः ॥ २ ॥ यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठत्यस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च चक्षुर्वाव प्रतिष्ठा ॥ ३ ॥ यो ह वै सम्पदं वेद संहास्मै कामाः पद्यन्ते दैवाश्च मानुषाश्च श्रोत्रं वाव सम्पत् ॥ ४ ॥ यो ह वा आयतनं वेदायतनं ह स्वानां भवति मनो ह वा आयतनम् ॥ ५ ॥ अथ ह प्राणा अहंश्रेयसि व्यूदिरेऽहंश्रेयानस्म्यहं श्रेयानस्मीति ॥ ६ ॥ ते ह प्राणाः प्रजापतिं पितरमेत्योचुर्भगवन्को नः श्रेष्ठ इति तान्होवाच यस्मिन्व उत्क्रान्ते शरीरं पापिष्ठतरमिव दृश्येत स वः श्रेष्ठ इति ॥ ७ ॥ सा ह वागुच्चक्राम सा संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा कला अवदन्तः प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह वाक् ॥ ८ ॥ चक्षुर्होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथान्धा अपश्यन्तः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह चक्षुः ॥ ९ ॥ श्रोत्रं होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा बधिरा अशृण्वन्तः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह श्रोत्रम् ॥ १० ॥ मनो होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा बाला अमनसः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेणैवमिति प्रविवेश ह मनः ॥ ११ ॥ अथ ह प्राण उच्चिक्रमिषन्स यथा सुहयः पड्वीशशङ्कून्संखिदेदेवमितरान्प्राणान्समखिदत्तं हाभिसमेत्योचुर्भगवन्नेधि त्वं नः श्रेष्ठोऽसि मोत्क्रमीरिति ॥ १२ ॥ अथ हैनं वागुवाच यदहं वसिष्ठोऽस्मि त्वं तद्वसिष्ठोऽसीत्यथ हैनं चक्षुरुवाच यदहं प्रतिष्ठास्मि त्वं तत्प्रतिष्ठासीति ॥ १३ ॥ अथ हैनंश्रोत्रमुवाच यदहं सम्पदस्मि त्वं तत्सम्पदसीत्यथ हैनं मन उवाच यदहमायतनमस्मि त्वं तदायतनमसीति ॥ १४ ॥ न वै वाचो न चक्षूंषि न श्रोत्राणि न मनांसीत्याचक्षते प्राणा इत्येवाचक्षते प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति ॥ १५ ॥
One who knows the eldest and the best becomes indeed the eldest and the best; breath is truly the eldest and the best. One who knows the most excellent becomes the most excellent among his own people; speech is truly the most excellent. One who knows the support finds firm support in this world and in that world; the eye is truly the support. One who knows prosperity finds that both divine and human desires come to him; the ear is truly prosperity. One who knows the abode becomes an abode for his own people; the mind is truly the abode. Now, once the vital powers disputed among themselves about their own superiority, each saying, 'I am superior, I am superior.' They went to their father, Prajapati, and said, 'Venerable one, which of us is the best?' He said to them, 'That one of you, upon whose departure the body would seem to fare worst, is the best among you.' Speech then departed; having stayed away a year, it returned and said, 'How were you able to live without me?' They replied, 'As the mute live, not speaking, yet breathing with breath, seeing with the eye, hearing with the ear, thinking with the mind - so we lived.' So speech re-entered. The eye then departed; having stayed away a year, it returned and said, 'How were you able to live without me?' They replied, 'As the blind live, not seeing, yet breathing with breath, speaking with speech, hearing with the ear, thinking with the mind - so we lived.' So the eye re-entered. The ear then departed; having stayed away a year, it returned and said, 'How were you able to live without me?' They replied, 'As the deaf live, not hearing, yet breathing with breath, speaking with speech, seeing with the eye, thinking with the mind - so we lived.' So the ear re-entered. The mind then departed; having stayed away a year, it returned and said, 'How were you able to live without me?' They replied, 'As children without minds live, senseless, yet breathing with breath, speaking with speech, seeing with the eye, hearing with the ear - so we lived.' So the mind re-entered. Then, as breath was about to depart, it dragged along the other powers with it, as a fine horse might tear up the pegs to which its hooves are tethered. They all gathered around it and said, 'Sir, stay; you are the best among us - do not depart.' Then speech said to it, 'What I am - the most excellent - you are that.' The eye said to it, 'What I am - the support - you are that.' The ear said to it, 'What I am - prosperity - you are that.' The mind said to it, 'What I am - the abode - you are that.' And people do not call them speeches, eyes, ears, or minds - they call them breaths, for breath alone becomes all of these.
The Contest of the Vital Powers
॥ इति चतुर्थोऽध्यायः ॥ ॥ पञ्चमोऽध्यायः ॥ यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च ह वै श्रेष्ठश्च भवति प्राणो वाव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च ॥ १ ॥ यो ह वै वसिष्ठं वेद वसिष्ठो ह स्वानां भवति वाग्वाव वसिष्ठः ॥ २ ॥ यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठत्यस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च चक्षुर्वाव प्रतिष्ठा ॥ ३ ॥ यो ह वै सम्पदं वेद संहास्मै कामाः पद्यन्ते दैवाश्च मानुषाश्च श्रोत्रं वाव सम्पत् ॥ ४ ॥ यो ह वा आयतनं वेदायतनं ह स्वानां भवति मनो ह वा आयतनम् ॥ ५ ॥ अथ ह प्राणा अहंश्रेयसि व्यूदिरेऽहंश्रेयानस्म्यहं श्रेयानस्मीति ॥ ६ ॥ ते ह प्राणाः प्रजापतिं पितरमेत्योचुर्भगवन्को नः श्रेष्ठ इति तान्होवाच यस्मिन्व उत्क्रान्ते शरीरं पापिष्ठतरमिव दृश्येत स वः श्रेष्ठ इति ॥ ७ ॥ सा ह वागुच्चक्राम सा संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा कला अवदन्तः प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह वाक् ॥ ८ ॥ चक्षुर्होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथान्धा अपश्यन्तः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह चक्षुः ॥ ९ ॥ श्रोत्रं होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा बधिरा अशृण्वन्तः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह श्रोत्रम् ॥ १० ॥ मनो होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा बाला अमनसः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेणैवमिति प्रविवेश ह मनः ॥ ११ ॥ अथ ह प्राण उच्चिक्रमिषन्स यथा सुहयः पड्वीशशङ्कून्संखिदेदेवमितरान्प्राणान्समखिदत्तं हाभिसमेत्योचुर्भगवन्नेधि त्वं नः श्रेष्ठोऽसि मोत्क्रमीरिति ॥ १२ ॥ अथ हैनं वागुवाच यदहं वसिष्ठोऽस्मि त्वं तद्वसिष्ठोऽसीत्यथ हैनं चक्षुरुवाच यदहं प्रतिष्ठास्मि त्वं तत्प्रतिष्ठासीति ॥ १३ ॥ अथ हैनंश्रोत्रमुवाच यदहं सम्पदस्मि त्वं तत्सम्पदसीत्यथ हैनं मन उवाच यदहमायतनमस्मि त्वं तदायतनमसीति ॥ १४ ॥ न वै वाचो न चक्षूंषि न श्रोत्राणि न मनांसीत्याचक्षते प्राणा इत्येवाचक्षते प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति ॥ १५ ॥
जो ज्येष्ठ और श्रेष्ठ को जानता है, वह स्वयं ज्येष्ठ और श्रेष्ठ बन जाता है; प्राण ही वस्तुतः ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है। जो वसिष्ठ को जानता है, वह अपने लोगों में सर्वाधिक उत्कृष्ट बन जाता है; वाणी ही वस्तुतः वसिष्ठ है। जो प्रतिष्ठा को जानता है, वह इस लोक और उस लोक में सुदृढ़ प्रतिष्ठा पाता है; नेत्र ही वस्तुतः प्रतिष्ठा है। जो सम्पद् को जानता है, उसके पास दैवी और मानवी दोनों कामनाएँ आती हैं; कान ही वस्तुतः सम्पद् है। जो आयतन को जानता है, वह अपने लोगों के लिए आयतन (आश्रय) बन जाता है; मन ही वस्तुतः आयतन है। एक बार प्राणों में आपस में विवाद हुआ, प्रत्येक कहता था, 'मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ।' वे अपने पिता प्रजापति के पास गए और बोले, 'भगवन्, हममें श्रेष्ठ कौन है?' उन्होंने कहा, 'तुममें से जिसके निकल जाने पर शरीर सबसे बुरी दशा में प्रतीत हो, वही तुममें श्रेष्ठ है।' तब वाणी निकल गई; एक वर्ष बाहर रहकर वह लौटी और बोली, 'तुम मेरे बिना कैसे जी सके?' उन्होंने कहा, 'जैसे मूक लोग जीते हैं, बिना बोले, परन्तु प्राण से साँस लेते, नेत्र से देखते, कान से सुनते, मन से सोचते - वैसे ही हम जिए।' तब वाणी पुनः प्रविष्ट हो गई। तब नेत्र निकल गया; एक वर्ष बाहर रहकर वह लौटा और बोला, 'तुम मेरे बिना कैसे जी सके?' उन्होंने कहा, 'जैसे अन्धे जीते हैं, बिना देखे, परन्तु प्राण से साँस लेते, वाणी से बोलते, कान से सुनते, मन से सोचते - वैसे ही हम जिए।' तब नेत्र पुनः प्रविष्ट हो गया। तब कान निकल गया; एक वर्ष बाहर रहकर वह लौटा और बोला, 'तुम मेरे बिना कैसे जी सके?' उन्होंने कहा, 'जैसे बहरे जीते हैं, बिना सुने, परन्तु प्राण से साँस लेते, वाणी से बोलते, नेत्र से देखते, मन से सोचते - वैसे ही हम जिए।' तब कान पुनः प्रविष्ट हो गया। तब मन निकल गया; एक वर्ष बाहर रहकर वह लौटा और बोला, 'तुम मेरे बिना कैसे जी सके?' उन्होंने कहा, 'जैसे मन-रहित बालक जीते हैं, विचारहीन, परन्तु प्राण से साँस लेते, वाणी से बोलते, नेत्र से देखते, कान से सुनते - वैसे ही हम जिए।' तब मन पुनः प्रविष्ट हो गया। फिर जब प्राण निकलने को हुआ, तो उसने अन्य सब शक्तियों को भी अपने साथ खींच लिया, जैसे उत्तम घोड़ा अपने बाँधने के खूँटों को उखाड़ देता है। तब सबने उसे घेरकर कहा, 'महोदय, रहिए; आप ही हममें श्रेष्ठ हैं - मत निकलिए।' तब वाणी ने उससे कहा, 'जो मैं हूँ - वसिष्ठ - वह तुम हो।' नेत्र ने उससे कहा, 'जो मैं हूँ - प्रतिष्ठा - वह तुम हो।' कान ने उससे कहा, 'जो मैं हूँ - सम्पद् - वह तुम हो।' मन ने उससे कहा, 'जो मैं हूँ - आयतन - वह तुम हो।' और लोग उन्हें वाणी, नेत्र, कान या मन नहीं कहते - वे उन्हें प्राण कहते हैं, क्योंकि प्राण ही इन सबका रूप बन जाता है।
The Contest of the Vital Powers
॥ इति चतुर्थोऽध्यायः ॥ ॥ पञ्चमोऽध्यायः ॥ यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च ह वै श्रेष्ठश्च भवति प्राणो वाव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च ॥ १ ॥ यो ह वै वसिष्ठं वेद वसिष्ठो ह स्वानां भवति वाग्वाव वसिष्ठः ॥ २ ॥ यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठत्यस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च चक्षुर्वाव प्रतिष्ठा ॥ ३ ॥ यो ह वै सम्पदं वेद संहास्मै कामाः पद्यन्ते दैवाश्च मानुषाश्च श्रोत्रं वाव सम्पत् ॥ ४ ॥ यो ह वा आयतनं वेदायतनं ह स्वानां भवति मनो ह वा आयतनम् ॥ ५ ॥ अथ ह प्राणा अहंश्रेयसि व्यूदिरेऽहंश्रेयानस्म्यहं श्रेयानस्मीति ॥ ६ ॥ ते ह प्राणाः प्रजापतिं पितरमेत्योचुर्भगवन्को नः श्रेष्ठ इति तान्होवाच यस्मिन्व उत्क्रान्ते शरीरं पापिष्ठतरमिव दृश्येत स वः श्रेष्ठ इति ॥ ७ ॥ सा ह वागुच्चक्राम सा संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा कला अवदन्तः प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह वाक् ॥ ८ ॥ चक्षुर्होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथान्धा अपश्यन्तः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह चक्षुः ॥ ९ ॥ श्रोत्रं होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा बधिरा अशृण्वन्तः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह श्रोत्रम् ॥ १० ॥ मनो होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा बाला अमनसः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेणैवमिति प्रविवेश ह मनः ॥ ११ ॥ अथ ह प्राण उच्चिक्रमिषन्स यथा सुहयः पड्वीशशङ्कून्संखिदेदेवमितरान्प्राणान्समखिदत्तं हाभिसमेत्योचुर्भगवन्नेधि त्वं नः श्रेष्ठोऽसि मोत्क्रमीरिति ॥ १२ ॥ अथ हैनं वागुवाच यदहं वसिष्ठोऽस्मि त्वं तद्वसिष्ठोऽसीत्यथ हैनं चक्षुरुवाच यदहं प्रतिष्ठास्मि त्वं तत्प्रतिष्ठासीति ॥ १३ ॥ अथ हैनंश्रोत्रमुवाच यदहं सम्पदस्मि त्वं तत्सम्पदसीत्यथ हैनं मन उवाच यदहमायतनमस्मि त्वं तदायतनमसीति ॥ १४ ॥ न वै वाचो न चक्षूंषि न श्रोत्राणि न मनांसीत्याचक्षते प्राणा इत्येवाचक्षते प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति ॥ १५ ॥
जो ज्येष्ठ आणि श्रेष्ठ जाणतो, तो स्वतः ज्येष्ठ आणि श्रेष्ठ बनतो; प्राणच खरोखर ज्येष्ठ आणि श्रेष्ठ आहे. जो वसिष्ठ जाणतो, तो आपल्या लोकांमध्ये सर्वाधिक उत्कृष्ट बनतो; वाणीच खरोखर वसिष्ठ आहे. जो प्रतिष्ठा जाणतो, तो या लोकात आणि त्या लोकात सुदृढ प्रतिष्ठा मिळवतो; डोळाच खरोखर प्रतिष्ठा आहे. जो संपद जाणतो, त्याच्याकडे दैवी आणि मानवी दोन्ही इच्छा येतात; कानच खरोखर संपद आहे. जो आयतन जाणतो, तो आपल्या लोकांसाठी आयतन (आश्रय) बनतो; मनच खरोखर आयतन आहे. एकदा प्राणांमध्ये आपापसात वाद झाला, प्रत्येकजण म्हणत होता, 'मी श्रेष्ठ आहे, मी श्रेष्ठ आहे.' ते आपल्या पित्याकडे, प्रजापतीकडे गेले आणि म्हणाले, 'भगवन, आमच्यात श्रेष्ठ कोण आहे?' त्याने त्यांना सांगितले, 'तुमच्यापैकी ज्याच्या निघून जाण्याने शरीर सर्वात वाईट स्थितीत दिसेल, तोच तुमच्यात श्रेष्ठ आहे.' मग वाणी निघून गेली; एक वर्ष बाहेर राहून ती परतली आणि म्हणाली, 'तुम्ही माझ्याविना कसे जगलात?' ते म्हणाले, 'जसे मुके लोक जगतात, न बोलता, पण प्राणाने श्वास घेत, डोळ्याने पाहत, कानाने ऐकत, मनाने विचार करत - तसेच आम्ही जगलो.' मग वाणी पुन्हा प्रविष्ट झाली. मग डोळा निघून गेला; एक वर्ष बाहेर राहून तो परतला आणि म्हणाला, 'तुम्ही माझ्याविना कसे जगलात?' ते म्हणाले, 'जसे आंधळे जगतात, न पाहता, पण प्राणाने श्वास घेत, वाणीने बोलत, कानाने ऐकत, मनाने विचार करत - तसेच आम्ही जगलो.' मग डोळा पुन्हा प्रविष्ट झाला. मग कान निघून गेला; एक वर्ष बाहेर राहून तो परतला आणि म्हणाला, 'तुम्ही माझ्याविना कसे जगलात?' ते म्हणाले, 'जसे बहिरे जगतात, न ऐकता, पण प्राणाने श्वास घेत, वाणीने बोलत, डोळ्याने पाहत, मनाने विचार करत - तसेच आम्ही जगलो.' मग कान पुन्हा प्रविष्ट झाला. मग मन निघून गेले; एक वर्ष बाहेर राहून ते परतले आणि म्हणाले, 'तुम्ही माझ्याविना कसे जगलात?' ते म्हणाले, 'जसे मनरहित मुले जगतात, विचारशून्य, पण प्राणाने श्वास घेत, वाणीने बोलत, डोळ्याने पाहत, कानाने ऐकत - तसेच आम्ही जगलो.' मग मन पुन्हा प्रविष्ट झाले. मग जेव्हा प्राण निघण्यास निघाला, तेव्हा त्याने इतर सर्व शक्तींनाही आपल्यासोबत खेचले, जसा उत्तम घोडा आपले बांधण्याचे खुंट उपटून टाकतो. तेव्हा सर्वांनी त्याला घेरून म्हटले, 'महाराज, राहा; आपणच आमच्यात श्रेष्ठ आहात - निघू नका.' तेव्हा वाणीने त्याला म्हटले, 'जे मी आहे - वसिष्ठ - ते तू आहेस.' डोळ्याने त्याला म्हटले, 'जे मी आहे - प्रतिष्ठा - ते तू आहेस.' कानाने त्याला म्हटले, 'जे मी आहे - संपद - ते तू आहेस.' मनाने त्याला म्हटले, 'जे मी आहे - आयतन - ते तू आहेस.' आणि लोक त्यांना वाणी, डोळे, कान किंवा मन म्हणत नाहीत - ते त्यांना प्राण म्हणतात, कारण प्राणच या सर्वांचे रूप बनतो.