The Fifth Offering Satisfies Udana
अथ यां पञ्चमीं जुहुयात्तां जुहुयादुदानाय स्वाहेत्युदानस्तृप्यति ॥ १ ॥ उदाने तृप्यति त्वक्तृप्यति त्वचि तृप्यन्त्यां वायुस्तृप्यति वायौ तृप्यत्याकाशस्तृप्यत्याकाशे तृप्यति यत्किंच वायुश्चाकाशश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेन ॥ २ ॥
Then the fifth oblation one offers, one should offer saying, 'To the up-breath, svaha' - then the up-breath is satisfied. When the up-breath is satisfied, the skin is satisfied; when the skin is satisfied, wind is satisfied; when wind is satisfied, space is satisfied; and whatever wind and space preside over becomes satisfied along with them. Following that satisfaction, the worshiper himself becomes satisfied with offspring, cattle, food, vigor, and sacred lustre.
The Fifth Offering Satisfies Udana
अथ यां पञ्चमीं जुहुयात्तां जुहुयादुदानाय स्वाहेत्युदानस्तृप्यति ॥ १ ॥ उदाने तृप्यति त्वक्तृप्यति त्वचि तृप्यन्त्यां वायुस्तृप्यति वायौ तृप्यत्याकाशस्तृप्यत्याकाशे तृप्यति यत्किंच वायुश्चाकाशश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेन ॥ २ ॥
फिर जो पाँचवीं आहुति दी जाए, वह 'उदान के लिए स्वाहा' कहकर दी जानी चाहिए - तब उदान तृप्त होता है। उदान के तृप्त होने पर त्वचा तृप्त होती है; त्वचा के तृप्त होने पर वायु तृप्त होता है; वायु के तृप्त होने पर आकाश तृप्त होता है; और वायु तथा आकाश जिन-जिन पर शासन करते हैं, वे सब भी उनके साथ तृप्त हो जाते हैं। उस तृप्ति के अनुसरण में, यजनकर्ता स्वयं सन्तान, पशु, अन्न, तेज और ब्रह्मतेज से तृप्त होता है।
The Fifth Offering Satisfies Udana
अथ यां पञ्चमीं जुहुयात्तां जुहुयादुदानाय स्वाहेत्युदानस्तृप्यति ॥ १ ॥ उदाने तृप्यति त्वक्तृप्यति त्वचि तृप्यन्त्यां वायुस्तृप्यति वायौ तृप्यत्याकाशस्तृप्यत्याकाशे तृप्यति यत्किंच वायुश्चाकाशश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेन ॥ २ ॥
मग जी पाचवी आहुती दिली जाईल, ती 'उदानासाठी स्वाहा' म्हणून द्यावी - तेव्हा उदान तृप्त होतो. उदान तृप्त झाल्यावर त्वचा तृप्त होते; त्वचा तृप्त झाल्यावर वायू तृप्त होतो; वायू तृप्त झाल्यावर आकाश तृप्त होते; आणि वायू तसेच आकाश ज्या-ज्यावर शासन करतात, ते सर्वही त्यांच्यासोबत तृप्त होतात. त्या तृप्तीच्या अनुसरणात, यजनकर्ता स्वतः संतती, पशू, अन्न, तेज आणि ब्रह्मतेजाने तृप्त होतो.