The Fourth Offering Satisfies Samana
अथ यां चतुर्थीं जुहुयात्तां जुहुयात्समानाय स्वाहेति समानस्तृप्यति ॥ १ ॥ समाने तृप्यति मनस्तृप्यति मनसि तृप्यति पर्जन्यस्तृप्यति पर्जन्ये तृप्यति विद्युत्तृप्यति विद्युति तृप्यन्त्यां यत्किंच विद्युच्च पर्जन्यश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥
Then the fourth oblation one offers, one should offer saying, 'To the equalizing breath, svaha' - then the equalizing breath is satisfied. When the equalizing breath is satisfied, the mind is satisfied; when the mind is satisfied, the rain-cloud is satisfied; when the rain-cloud is satisfied, lightning is satisfied; and whatever lightning and the rain-cloud preside over becomes satisfied along with them. Following that satisfaction, the worshiper himself becomes satisfied with offspring, cattle, food, vigor, and sacred lustre.
The Fourth Offering Satisfies Samana
अथ यां चतुर्थीं जुहुयात्तां जुहुयात्समानाय स्वाहेति समानस्तृप्यति ॥ १ ॥ समाने तृप्यति मनस्तृप्यति मनसि तृप्यति पर्जन्यस्तृप्यति पर्जन्ये तृप्यति विद्युत्तृप्यति विद्युति तृप्यन्त्यां यत्किंच विद्युच्च पर्जन्यश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥
फिर जो चौथी आहुति दी जाए, वह 'समान के लिए स्वाहा' कहकर दी जानी चाहिए - तब समान तृप्त होता है। समान के तृप्त होने पर मन तृप्त होता है; मन के तृप्त होने पर पर्जन्य तृप्त होता है; पर्जन्य के तृप्त होने पर विद्युत् तृप्त होती है; और विद्युत् तथा पर्जन्य जिन-जिन पर शासन करते हैं, वे सब भी उनके साथ तृप्त हो जाते हैं। उस तृप्ति के अनुसरण में, यजनकर्ता स्वयं सन्तान, पशु, अन्न, तेज और ब्रह्मतेज से तृप्त होता है।
The Fourth Offering Satisfies Samana
अथ यां चतुर्थीं जुहुयात्तां जुहुयात्समानाय स्वाहेति समानस्तृप्यति ॥ १ ॥ समाने तृप्यति मनस्तृप्यति मनसि तृप्यति पर्जन्यस्तृप्यति पर्जन्ये तृप्यति विद्युत्तृप्यति विद्युति तृप्यन्त्यां यत्किंच विद्युच्च पर्जन्यश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥
मग जी चौथी आहुती दिली जाईल, ती 'समानासाठी स्वाहा' म्हणून द्यावी - तेव्हा समान तृप्त होतो. समान तृप्त झाल्यावर मन तृप्त होते; मन तृप्त झाल्यावर पर्जन्य तृप्त होतो; पर्जन्य तृप्त झाल्यावर विद्युत तृप्त होते; आणि विद्युत तसेच पर्जन्य ज्या-ज्यावर शासन करतात, ते सर्वही त्यांच्यासोबत तृप्त होतात. त्या तृप्तीच्या अनुसरणात, यजनकर्ता स्वतः संतती, पशू, अन्न, तेज आणि ब्रह्मतेजाने तृप्त होतो.