The Rathantara Chant in the Fire
अभिमन्थति स हिंकारो धूमो जायते स प्रस्तावो ज्वलति स उद्गीथोऽङ्गारा भवन्ति स प्रतिहार उपशाम्यति तन्निधनं संशाम्यति तन्निधनमेतद्रथंतरमग्नौ प्रोतम् ॥ १ ॥ स य एवमेतद्रथंतरमग्नौ प्रोतं वेद ब्रह्मवर्चस्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या न प्रत्यङ्ङ्ग्निमाचामेन्न निष्ठीवेत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥
The Rathantara chant is inlaid in fire: the beginning of the churning is the hinkara, the smoke that rises is the prastava, the blazing is the udgitha, the embers are the pratihara, the dying down is the nidhana, and the going out completely is the nidhana as well. One who thus knows this Rathantara chant inlaid in fire becomes radiant with sacred lustre, an eater of food, attains his full span of life, lives long, becomes great through progeny and cattle, and great in fame; let his rule of life be that he never sips water facing the fire, nor spits before it.
The Rathantara Chant in the Fire
अभिमन्थति स हिंकारो धूमो जायते स प्रस्तावो ज्वलति स उद्गीथोऽङ्गारा भवन्ति स प्रतिहार उपशाम्यति तन्निधनं संशाम्यति तन्निधनमेतद्रथंतरमग्नौ प्रोतम् ॥ १ ॥ स य एवमेतद्रथंतरमग्नौ प्रोतं वेद ब्रह्मवर्चस्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या न प्रत्यङ्ङ्ग्निमाचामेन्न निष्ठीवेत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥
रथन्तर साम अग्नि में समाहित है - मन्थन का आरम्भ हिंकार है, उठता हुआ धुआँ प्रस्ताव है, प्रज्वलित होना उद्गीथ है, अंगारे प्रतिहार हैं, शान्त होना निधन है, और पूर्णतः बुझ जाना भी निधन है। जो यह जानकर अग्नि में समाहित इस रथन्तर साम की उपासना करता है, वह ब्रह्मतेज से युक्त, अन्नाद बनता है, पूर्ण आयु पाता है, दीर्घजीवी होता है, सन्तान और पशुओं से महान् बनता है, कीर्ति से महान् बनता है; उसका व्रत यह हो कि वह कभी अग्नि की ओर मुँह करके जल न पिए, न उसके सामने थूके।
The Rathantara Chant in the Fire
अभिमन्थति स हिंकारो धूमो जायते स प्रस्तावो ज्वलति स उद्गीथोऽङ्गारा भवन्ति स प्रतिहार उपशाम्यति तन्निधनं संशाम्यति तन्निधनमेतद्रथंतरमग्नौ प्रोतम् ॥ १ ॥ स य एवमेतद्रथंतरमग्नौ प्रोतं वेद ब्रह्मवर्चस्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या न प्रत्यङ्ङ्ग्निमाचामेन्न निष्ठीवेत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥
रथंतर साम अग्नीमध्ये समाविष्ट आहे - मंथनाचा आरंभ हिंकार आहे, उठणारा धूर प्रस्ताव आहे, प्रज्वलित होणे उद्गीथ आहे, निखारे प्रतिहार आहेत, शांत होणे निधन आहे, आणि पूर्णपणे विझणेही निधन आहे. जो हे जाणून अग्नीमध्ये समाविष्ट या रथंतर सामाची उपासना करतो, तो ब्रह्मतेजाने युक्त, अन्नाद बनतो, पूर्ण आयुष्य मिळवतो, दीर्घायुषी होतो, संतती आणि पशूंनी महान बनतो, कीर्तीने महान बनतो; त्याचे व्रत हे असावे की त्याने कधीही अग्नीकडे तोंड करून पाणी पिऊ नये, त्याच्यासमोर थुंकू नये.