The Second Offering Satisfies Vyana
अथ यां द्वितीयां जुहुयात्तां जुहुयाद्व्यानाय स्वाहेति व्यानस्तृप्यति ॥ १ ॥ व्याने तृप्यति श्रोत्रं तृप्यति श्रोत्रे तृप्यति चन्द्रमास्तृप्यति चन्द्रमसि तृप्यति दिशस्तृप्यन्ति दिक्षु तृप्यन्तीषु यत्किंच दिशश्च चन्द्रमाश्चाधितिष्ठन्ति तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥
Then the second oblation one offers, one should offer saying, 'To the pervading breath, svaha' - then the pervading breath is satisfied. When the pervading breath is satisfied, the ear is satisfied; when the ear is satisfied, the moon is satisfied; when the moon is satisfied, the quarters of the sky are satisfied; and whatever the quarters and the moon preside over becomes satisfied along with them. Following that satisfaction, the worshiper himself becomes satisfied with offspring, cattle, food, vigor, and sacred lustre.
The Second Offering Satisfies Vyana
अथ यां द्वितीयां जुहुयात्तां जुहुयाद्व्यानाय स्वाहेति व्यानस्तृप्यति ॥ १ ॥ व्याने तृप्यति श्रोत्रं तृप्यति श्रोत्रे तृप्यति चन्द्रमास्तृप्यति चन्द्रमसि तृप्यति दिशस्तृप्यन्ति दिक्षु तृप्यन्तीषु यत्किंच दिशश्च चन्द्रमाश्चाधितिष्ठन्ति तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥
फिर जो दूसरी आहुति दी जाए, वह 'व्यान के लिए स्वाहा' कहकर दी जानी चाहिए - तब व्यान तृप्त होता है। व्यान के तृप्त होने पर कान तृप्त होता है; कान के तृप्त होने पर चन्द्रमा तृप्त होता है; चन्द्रमा के तृप्त होने पर दिशाएँ तृप्त होती हैं; और दिशाएँ तथा चन्द्रमा जिन-जिन पर शासन करते हैं, वे सब भी उनके साथ तृप्त हो जाते हैं। उस तृप्ति के अनुसरण में, यजनकर्ता स्वयं सन्तान, पशु, अन्न, तेज और ब्रह्मतेज से तृप्त होता है।
The Second Offering Satisfies Vyana
अथ यां द्वितीयां जुहुयात्तां जुहुयाद्व्यानाय स्वाहेति व्यानस्तृप्यति ॥ १ ॥ व्याने तृप्यति श्रोत्रं तृप्यति श्रोत्रे तृप्यति चन्द्रमास्तृप्यति चन्द्रमसि तृप्यति दिशस्तृप्यन्ति दिक्षु तृप्यन्तीषु यत्किंच दिशश्च चन्द्रमाश्चाधितिष्ठन्ति तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥
मग जी दुसरी आहुती दिली जाईल, ती 'व्यानासाठी स्वाहा' म्हणून द्यावी - तेव्हा व्यान तृप्त होतो. व्यान तृप्त झाल्यावर कान तृप्त होतो; कान तृप्त झाल्यावर चंद्र तृप्त होतो; चंद्र तृप्त झाल्यावर दिशा तृप्त होतात; आणि दिशा तसेच चंद्र ज्या-ज्यावर शासन करतात, ते सर्वही त्यांच्यासोबत तृप्त होतात. त्या तृप्तीच्या अनुसरणात, यजनकर्ता स्वतः संतती, पशू, अन्न, तेज आणि ब्रह्मतेजाने तृप्त होतो.