The Swan Teaches the Third Foot
हंसस्ते पादं वक्तेति स ह श्वोभूते गा अभिप्रस्थापयांचकार ता यत्राभि सायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङुपोपविवेश ॥ १ ॥ तंहंस उपनिपत्याभ्युवाद सत्यकाम३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ २ ॥ ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाचाग्निः कला सूर्यः कला चन्द्रः कला विद्युत्कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणो ज्योतिष्मान्नाम ॥ ३ ॥ स य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणो ज्योतिष्मानित्युपास्ते ज्योतिष्मानस्मिंल्लोके भवति ज्योतिष्मतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणो ज्योतिष्मानित्युपास्ते ॥ ४ ॥
'The swan will declare to you the next foot,' the fire said. The next day, Satyakama drove the cattle onward. Where evening came upon them, he built a fire, penned the cows, laid fuel on the fire, and sat down facing east, behind the fire. Then a swan flew down to him and said, 'Satyakama!' 'Sir, I am listening,' he replied. The swan said, 'My dear, I will declare to you one foot of Brahman.' 'Speak, sir,' Satyakama said. The swan said to him, 'Fire is one part, the sun is one part, the moon is one part, lightning is one part; this, my dear, is the four-part foot of Brahman called the Luminous One. One who knows this and meditates on this four-part foot of Brahman as the Luminous One becomes luminous in this world; he conquers luminous worlds, who thus knows this and meditates on this four-part foot of Brahman as the Luminous One.'
The Swan Teaches the Third Foot
हंसस्ते पादं वक्तेति स ह श्वोभूते गा अभिप्रस्थापयांचकार ता यत्राभि सायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङुपोपविवेश ॥ १ ॥ तंहंस उपनिपत्याभ्युवाद सत्यकाम३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ २ ॥ ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाचाग्निः कला सूर्यः कला चन्द्रः कला विद्युत्कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणो ज्योतिष्मान्नाम ॥ ३ ॥ स य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणो ज्योतिष्मानित्युपास्ते ज्योतिष्मानस्मिंल्लोके भवति ज्योतिष्मतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणो ज्योतिष्मानित्युपास्ते ॥ ४ ॥
'अगला पाद हंस तुम्हें बताएगा,' अग्नि ने कहा। अगले दिन सत्यकाम ने गायों को आगे हाँका। जहाँ सन्ध्या हुई, वहाँ उसने अग्नि जलाई, गायों को घेरा, अग्नि में समिधा डाली, और अग्नि के पीछे पूर्वाभिमुख होकर बैठ गया। तब एक हंस उड़कर उसके पास आया और बोला, 'सत्यकाम!' 'भगवन्, मैं सुन रहा हूँ,' उसने उत्तर दिया। हंस ने कहा, 'सोम्य, मैं तुम्हें ब्रह्म का एक पाद बताऊँगा।' 'कहिए, भगवन्,' सत्यकाम ने कहा। हंस ने उससे कहा, 'अग्नि एक कला है, सूर्य एक कला है, चन्द्रमा एक कला है, विद्युत् एक कला है; सोम्य, यही ब्रह्म का चतुष्कल पाद है, जिसे 'ज्योतिष्मान्' कहते हैं। जो यह जानकर ब्रह्म के इस चतुष्कल पाद की 'ज्योतिष्मान्' के रूप में उपासना करता है, वह इस लोक में ज्योतिष्मान् बनता है; वह ज्योतिर्मय लोकों को जीतता है, जो यह जानकर ब्रह्म के इस चतुष्कल पाद की इस प्रकार उपासना करता है।'
The Swan Teaches the Third Foot
हंसस्ते पादं वक्तेति स ह श्वोभूते गा अभिप्रस्थापयांचकार ता यत्राभि सायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङुपोपविवेश ॥ १ ॥ तंहंस उपनिपत्याभ्युवाद सत्यकाम३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ २ ॥ ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाचाग्निः कला सूर्यः कला चन्द्रः कला विद्युत्कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणो ज्योतिष्मान्नाम ॥ ३ ॥ स य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणो ज्योतिष्मानित्युपास्ते ज्योतिष्मानस्मिंल्लोके भवति ज्योतिष्मतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणो ज्योतिष्मानित्युपास्ते ॥ ४ ॥
'पुढील पाऊल हंस तुला सांगेल,' अग्नी म्हणाली. दुसऱ्या दिवशी सत्यकामाने गायींना पुढे हाकलले. जिथे संध्याकाळ झाली, तिथे त्याने अग्नी पेटवली, गायींना घेरले, अग्नीत समिधा टाकल्या, आणि अग्नीच्या मागे पूर्वेकडे तोंड करून बसला. तेव्हा एक हंस उडत त्याच्याजवळ आला आणि म्हणाला, 'सत्यकामा!' 'भगवन, मी ऐकत आहे,' त्याने उत्तर दिले. हंस म्हणाला, 'सोम्या, मी तुला ब्रह्माचे एक पाऊल सांगेन.' 'सांगा, भगवन,' सत्यकाम म्हणाला. हंस त्याला म्हणाला, 'अग्नी एक कला आहे, सूर्य एक कला आहे, चंद्र एक कला आहे, विद्युत एक कला आहे; सोम्या, हेच ब्रह्माचे चतुष्कल पाऊल आहे, ज्याला 'ज्योतिष्मान' म्हणतात. जो हे जाणून ब्रह्माच्या या चतुष्कल पावलाची 'ज्योतिष्मान' म्हणून उपासना करतो, तो या लोकात ज्योतिष्मान बनतो; तो ज्योतिर्मय लोक जिंकतो, जो हे जाणून ब्रह्माच्या या चतुष्कल पावलाची अशा प्रकारे उपासना करतो.'