The Treasure-Chest of the Universe
अन्तरिक्षोदरः कोशो भूमिबुध्नो न जीर्यति दिशो ह्यस्य स्रक्तयो द्यौरस्योत्तरं बिलं स एष कोशो वसुधानस्तस्मिन्विश्वमिदं श्रितम् ॥ १ ॥ तस्य प्राची दिग्जुहूर्नाम सहमाना नाम दक्षिणा राज्ञी नाम प्रतीची सुभूता नामोदीची तासां वायुर्वत्सः स य एतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद न पुत्ररोदं रोदिति सोऽहमेतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद मा पुत्ररोदंरुदम् ॥ २ ॥ अरिष्टं कोशं प्रपद्येऽमुनामुनामुना प्राणं प्रपद्येऽमुनामुनामुना भूः प्रपद्येऽमुनामुनामुना भुवः प्रपद्येऽमुनामुनामुना स्वः प्रपद्येऽमुनामुनामुना ॥ ३ ॥ स यदवोचं प्राणं प्रपद्य इति प्राणो वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किंच तमेव तत्प्रापत्सि ॥ ४ ॥ अथ यदवोचं भूः प्रपद्य इति पृथिवीं प्रपद्येऽन्तरिक्षं प्रपद्ये दिवं प्रपद्य इत्येव तदवोचम् ॥ ५ ॥ अथ यदवोचं भुवः प्रपद्य इत्यग्निं प्रपद्ये वायुं प्रपद्य आदित्यं प्रपद्य इत्येव तदवोचम् ॥ ६ ॥ अथ यदवोचंस्वः प्रपद्य इत्यृग्वेदं प्रपद्ये यजुर्वेदं प्रपद्ये सामवेदं प्रपद्य इत्येव तदवोचं तदवोचम् ॥ ७ ॥
The chest whose inside is the atmosphere and whose bottom is the earth does not decay; its corners are the directions, and heaven is its upper opening. This chest is the storehouse of all treasure; in it rests this entire universe. Of its directions, the eastward one is named Juhu, the southward Sahamana, the westward Rajni, and the northward Subhuta. Their child is the wind; one who knows the wind thus, as the child of the directions, never weeps for the loss of his children. 'I take refuge in this imperishable chest by way of such and such; I take refuge in breath by way of such and such; I take refuge in Bhur by way of such and such; I take refuge in Bhuvah by way of such and such; I take refuge in Svah by way of such and such.' When I said, 'I take refuge in breath,' I meant this: breath indeed is this whole world of beings; it is to breath alone that I have gone. When I said, 'I take refuge in Bhur,' I meant: I take refuge in the earth, I take refuge in the atmosphere, I take refuge in heaven - that is what I meant. When I said, 'I take refuge in Bhuvah,' I meant: I take refuge in fire, I take refuge in wind, I take refuge in the sun - that is what I meant. And when I said, 'I take refuge in Svah,' I meant: I take refuge in the Rig-veda, I take refuge in the Yajur-veda, I take refuge in the Sama-veda - that is what I meant, that is what I meant.
The Treasure-Chest of the Universe
अन्तरिक्षोदरः कोशो भूमिबुध्नो न जीर्यति दिशो ह्यस्य स्रक्तयो द्यौरस्योत्तरं बिलं स एष कोशो वसुधानस्तस्मिन्विश्वमिदं श्रितम् ॥ १ ॥ तस्य प्राची दिग्जुहूर्नाम सहमाना नाम दक्षिणा राज्ञी नाम प्रतीची सुभूता नामोदीची तासां वायुर्वत्सः स य एतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद न पुत्ररोदं रोदिति सोऽहमेतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद मा पुत्ररोदंरुदम् ॥ २ ॥ अरिष्टं कोशं प्रपद्येऽमुनामुनामुना प्राणं प्रपद्येऽमुनामुनामुना भूः प्रपद्येऽमुनामुनामुना भुवः प्रपद्येऽमुनामुनामुना स्वः प्रपद्येऽमुनामुनामुना ॥ ३ ॥ स यदवोचं प्राणं प्रपद्य इति प्राणो वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किंच तमेव तत्प्रापत्सि ॥ ४ ॥ अथ यदवोचं भूः प्रपद्य इति पृथिवीं प्रपद्येऽन्तरिक्षं प्रपद्ये दिवं प्रपद्य इत्येव तदवोचम् ॥ ५ ॥ अथ यदवोचं भुवः प्रपद्य इत्यग्निं प्रपद्ये वायुं प्रपद्य आदित्यं प्रपद्य इत्येव तदवोचम् ॥ ६ ॥ अथ यदवोचंस्वः प्रपद्य इत्यृग्वेदं प्रपद्ये यजुर्वेदं प्रपद्ये सामवेदं प्रपद्य इत्येव तदवोचं तदवोचम् ॥ ७ ॥
जिसके भीतर अन्तरिक्ष है और जिसका तल पृथ्वी है, वह पिटारा (कोश) कभी जीर्ण नहीं होता; उसके कोने दिशाएँ हैं, और स्वर्ग उसका ऊपरी द्वार है। यह पिटारा समस्त धन का भण्डार है; इसी में यह सम्पूर्ण विश्व निहित है। इसकी दिशाओं में पूर्वी को जुहू, दक्षिणी को सहमाना, पश्चिमी को राज्ञी, और उत्तरी को सुभूता कहा जाता है। इनकी सन्तान वायु है; जो वायु को इस प्रकार दिशाओं की सन्तान के रूप में जानता है, वह कभी अपनी सन्तान के लिए विलाप नहीं करता। 'मैं इस अविनाशी पिटारे की शरण में जाता हूँ, अमुक-अमुक-अमुक के द्वारा; मैं प्राण की शरण में जाता हूँ, अमुक-अमुक-अमुक के द्वारा; मैं भूः की शरण में जाता हूँ, अमुक-अमुक-अमुक के द्वारा; मैं भुवः की शरण में जाता हूँ, अमुक-अमुक-अमुक के द्वारा; मैं स्वः की शरण में जाता हूँ, अमुक-अमुक-अमुक के द्वारा।' जब मैंने कहा, 'मैं प्राण की शरण में जाता हूँ,' तो इसका अर्थ यह था - प्राण ही यह सम्पूर्ण भूत-जगत् है; मैं उसी की शरण में गया हूँ। जब मैंने कहा, 'मैं भूः की शरण में जाता हूँ,' तो इसका अर्थ था - मैं पृथ्वी की शरण में जाता हूँ, अन्तरिक्ष की शरण में जाता हूँ, स्वर्ग की शरण में जाता हूँ। जब मैंने कहा, 'मैं भुवः की शरण में जाता हूँ,' तो इसका अर्थ था - मैं अग्नि की शरण में जाता हूँ, वायु की शरण में जाता हूँ, सूर्य की शरण में जाता हूँ। और जब मैंने कहा, 'मैं स्वः की शरण में जाता हूँ,' तो इसका अर्थ था - मैं ऋग्वेद की शरण में जाता हूँ, यजुर्वेद की शरण में जाता हूँ, सामवेद की शरण में जाता हूँ - यही मेरा अभिप्राय था।
The Treasure-Chest of the Universe
अन्तरिक्षोदरः कोशो भूमिबुध्नो न जीर्यति दिशो ह्यस्य स्रक्तयो द्यौरस्योत्तरं बिलं स एष कोशो वसुधानस्तस्मिन्विश्वमिदं श्रितम् ॥ १ ॥ तस्य प्राची दिग्जुहूर्नाम सहमाना नाम दक्षिणा राज्ञी नाम प्रतीची सुभूता नामोदीची तासां वायुर्वत्सः स य एतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद न पुत्ररोदं रोदिति सोऽहमेतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद मा पुत्ररोदंरुदम् ॥ २ ॥ अरिष्टं कोशं प्रपद्येऽमुनामुनामुना प्राणं प्रपद्येऽमुनामुनामुना भूः प्रपद्येऽमुनामुनामुना भुवः प्रपद्येऽमुनामुनामुना स्वः प्रपद्येऽमुनामुनामुना ॥ ३ ॥ स यदवोचं प्राणं प्रपद्य इति प्राणो वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किंच तमेव तत्प्रापत्सि ॥ ४ ॥ अथ यदवोचं भूः प्रपद्य इति पृथिवीं प्रपद्येऽन्तरिक्षं प्रपद्ये दिवं प्रपद्य इत्येव तदवोचम् ॥ ५ ॥ अथ यदवोचं भुवः प्रपद्य इत्यग्निं प्रपद्ये वायुं प्रपद्य आदित्यं प्रपद्य इत्येव तदवोचम् ॥ ६ ॥ अथ यदवोचंस्वः प्रपद्य इत्यृग्वेदं प्रपद्ये यजुर्वेदं प्रपद्ये सामवेदं प्रपद्य इत्येव तदवोचं तदवोचम् ॥ ७ ॥
ज्याच्या आत अंतरिक्ष आहे आणि ज्याचा तळ पृथ्वी आहे, तो पेटारा (कोश) कधीही जीर्ण होत नाही; त्याचे कोपरे दिशा आहेत, आणि स्वर्ग हे त्याचे वरचे द्वार आहे. हा पेटारा सर्व धनाचा भांडार आहे; यातच हे संपूर्ण विश्व सामावलेले आहे. याच्या दिशांपैकी पूर्वेकडील दिशेला जुहू, दक्षिणेकडील दिशेला सहमाना, पश्चिमेकडील दिशेला राज्ञी, आणि उत्तरेकडील दिशेला सुभूता म्हणतात. यांची संतती वायू आहे; जो वायूला अशा प्रकारे दिशांची संतती म्हणून जाणतो, तो कधीही आपल्या संततीसाठी विलाप करत नाही. 'मी या अविनाशी पेटाऱ्याला शरण जातो, अमुक-अमुक-अमुकाद्वारे; मी प्राणाला शरण जातो, अमुक-अमुक-अमुकाद्वारे; मी भूःला शरण जातो, अमुक-अमुक-अमुकाद्वारे; मी भुवःला शरण जातो, अमुक-अमुक-अमुकाद्वारे; मी स्वःला शरण जातो, अमुक-अमुक-अमुकाद्वारे.' जेव्हा मी म्हणालो, 'मी प्राणाला शरण जातो,' तेव्हा याचा अर्थ असा होता - प्राण हेच हे संपूर्ण भूत-जग आहे; मी त्यालाच शरण गेलो आहे. जेव्हा मी म्हणालो, 'मी भूःला शरण जातो,' तेव्हा याचा अर्थ होता - मी पृथ्वीला शरण जातो, अंतरिक्षाला शरण जातो, स्वर्गाला शरण जातो. जेव्हा मी म्हणालो, 'मी भुवःला शरण जातो,' तेव्हा याचा अर्थ होता - मी अग्नीला शरण जातो, वायूला शरण जातो, सूर्याला शरण जातो. आणि जेव्हा मी म्हणालो, 'मी स्वःला शरण जातो,' तेव्हा याचा अर्थ होता - मी ऋग्वेदाला शरण जातो, यजुर्वेदाला शरण जातो, सामवेदाला शरण जातो - हाच माझा अभिप्राय होता.