The Vamadevya Chant of Union
उपमन्त्रयते स हिंकारो ज्ञपयते स प्रस्तावः स्त्रिया सह शेते स उद्गीथः प्रति स्त्रीं सह शेते स प्रतिहारः कालं गच्छति तन्निधनं पारं गच्छति तन्निधनमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतम् ॥ १ ॥ स य एवमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतं वेद मिथुनी भवति मिथुनान्मिथुनात्प्रजायते सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या न कांचन परिहरेत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥
The Vamadevya chant is inlaid in the union of a couple: inviting her is the hinkara, making known one's consent is the prastava, lying down with her is the udgitha, lying facing her is the pratihara, the moment itself is the nidhana, and reaching completion is the nidhana as well. One who thus knows this Vamadevya chant inlaid in the union of a couple becomes united in a couple, is born again and again from such unions, attains his full span of life, lives long, becomes great through progeny and cattle, and great in fame; let his rule of life be that he never refuses any woman.
The Vamadevya Chant of Union
उपमन्त्रयते स हिंकारो ज्ञपयते स प्रस्तावः स्त्रिया सह शेते स उद्गीथः प्रति स्त्रीं सह शेते स प्रतिहारः कालं गच्छति तन्निधनं पारं गच्छति तन्निधनमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतम् ॥ १ ॥ स य एवमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतं वेद मिथुनी भवति मिथुनान्मिथुनात्प्रजायते सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या न कांचन परिहरेत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥
वामदेव्य साम मिथुन में समाहित है - निमंत्रण देना हिंकार है, सम्मति प्रकट करना प्रस्ताव है, स्त्री के साथ लेटना उद्गीथ है, स्त्री के सम्मुख लेटना प्रतिहार है, वह क्षण निधन है, और पूर्णता को पहुँचना भी निधन है। जो यह जानकर मिथुन में समाहित इस वामदेव्य साम की उपासना करता है, वह मिथुनवान बनता है, बार-बार मिथुन से जन्म पाता है, पूर्ण आयु पाता है, दीर्घजीवी होता है, सन्तान और पशुओं से महान् बनता है, कीर्ति से महान् बनता है; उसका व्रत यह हो कि वह किसी भी स्त्री को अस्वीकार न करे।
The Vamadevya Chant of Union
उपमन्त्रयते स हिंकारो ज्ञपयते स प्रस्तावः स्त्रिया सह शेते स उद्गीथः प्रति स्त्रीं सह शेते स प्रतिहारः कालं गच्छति तन्निधनं पारं गच्छति तन्निधनमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतम् ॥ १ ॥ स य एवमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतं वेद मिथुनी भवति मिथुनान्मिथुनात्प्रजायते सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या न कांचन परिहरेत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥
वामदेव्य साम मिथुनात समाविष्ट आहे - आमंत्रण देणे हिंकार आहे, संमती दर्शवणे प्रस्ताव आहे, स्त्रीसोबत झोपणे उद्गीथ आहे, स्त्रीसमोर झोपणे प्रतिहार आहे, तो क्षण निधन आहे, आणि पूर्णत्वाला पोहोचणेही निधन आहे. जो हे जाणून मिथुनात समाविष्ट या वामदेव्य सामाची उपासना करतो, तो मिथुनवान बनतो, वारंवार मिथुनातून जन्म घेतो, पूर्ण आयुष्य मिळवतो, दीर्घायुषी होतो, संतती आणि पशूंनी महान बनतो, कीर्तीने महान बनतो; त्याचे व्रत हे असावे की त्याने कोणत्याही स्त्रीला नाकारू नये.