Understanding Depends on Reflection
यदा वै मनुतेऽथ विजानाति नामत्वा विजानाति मत्वैव विजानाति मतिस्त्वेव विजिज्ञासितव्येति मतिं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
'It is only when one reflects that one understands; without reflecting, one does not understand. Only one who reflects understands. But reflection itself must be understood.' 'Venerable one, I wish to understand reflection.'
Understanding Depends on Reflection
यदा वै मनुतेऽथ विजानाति नामत्वा विजानाति मत्वैव विजानाति मतिस्त्वेव विजिज्ञासितव्येति मतिं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
'जब मनुष्य मनन करता है, तभी वह समझता है; बिना मनन किए वह नहीं समझता। जो मनन करता है, वही समझता है। परन्तु मति को भी समझा जाना चाहिए।' 'भगवन्, मैं मति को समझना चाहता हूँ।'
Understanding Depends on Reflection
यदा वै मनुतेऽथ विजानाति नामत्वा विजानाति मत्वैव विजानाति मतिस्त्वेव विजिज्ञासितव्येति मतिं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
'जेव्हा मनुष्य मनन करतो, तेव्हाच तो समजतो; मनन न करता तो समजत नाही. जो मनन करतो, तोच समजतो. पण मतीलाही समजून घेतले पाहिजे.' 'भगवन, मला मती समजून घ्यायची आहे.'