Where One Sees Nothing Else
यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमाथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पं यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मर्त्य्ं स भगवः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति स्वे महिम्नि यदि वा न महिम्नीति ॥ १ ॥ गोअश्वमिह महिमेत्याचक्षते हस्तिहिरण्यं दासभार्यं क्षेत्राण्यायतनानीति नाहमेवं ब्रवीमि ब्रवीमीति होवाचान्योह्यन्यस्मिन्प्रतिष्ठित इति ॥ २ ॥
'Where one sees nothing else, hears nothing else, understands nothing else - that is the Infinite. But where one sees something else, hears something else, understands something else - that is the finite. The Infinite alone is immortal, while the finite is mortal.' 'Venerable one, on what does the Infinite rest?' 'On its own greatness - or not even on greatness.' In common speech, people speak of greatness in terms of cattle and horses, elephants and gold, slaves and wives, lands and houses - but I do not speak in this way, I do not speak in this way,' he said, 'for in that case one thing rests on another. But this is otherwise.'
Where One Sees Nothing Else
यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमाथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पं यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मर्त्य्ं स भगवः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति स्वे महिम्नि यदि वा न महिम्नीति ॥ १ ॥ गोअश्वमिह महिमेत्याचक्षते हस्तिहिरण्यं दासभार्यं क्षेत्राण्यायतनानीति नाहमेवं ब्रवीमि ब्रवीमीति होवाचान्योह्यन्यस्मिन्प्रतिष्ठित इति ॥ २ ॥
'जहाँ मनुष्य कुछ और नहीं देखता, कुछ और नहीं सुनता, कुछ और नहीं समझता - वही भूमा है। परन्तु जहाँ मनुष्य कुछ और देखता है, कुछ और सुनता है, कुछ और समझता है - वही अल्प है। भूमा ही अमृत है, जबकि अल्प मर्त्य है।' 'भगवन्, भूमा किसमें प्रतिष्ठित है?' 'अपनी ही महिमा में - या महिमा में भी नहीं।' सामान्य भाषा में लोग गाय-घोड़े, हाथी-सोना, दास-पत्नी, भूमि-भवन के रूप में महिमा की बात करते हैं - परन्तु मैं इस प्रकार नहीं कहता, मैं इस प्रकार नहीं कहता,' उन्होंने कहा, 'क्योंकि उस स्थिति में एक वस्तु दूसरी पर टिकी होती है। परन्तु यह अन्यथा है।'
Where One Sees Nothing Else
यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमाथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पं यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मर्त्य्ं स भगवः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति स्वे महिम्नि यदि वा न महिम्नीति ॥ १ ॥ गोअश्वमिह महिमेत्याचक्षते हस्तिहिरण्यं दासभार्यं क्षेत्राण्यायतनानीति नाहमेवं ब्रवीमि ब्रवीमीति होवाचान्योह्यन्यस्मिन्प्रतिष्ठित इति ॥ २ ॥
'जिथे मनुष्य आणखी काही पाहत नाही, आणखी काही ऐकत नाही, आणखी काही समजत नाही - तोच भूमा आहे. पण जिथे मनुष्य आणखी काही पाहतो, आणखी काही ऐकतो, आणखी काही समजतो - तेच अल्प आहे. भूमाच अमृत आहे, तर अल्प मर्त्य आहे.' 'भगवन, भूमा कशावर प्रतिष्ठित आहे?' 'स्वतःच्याच महिम्यावर - किंवा महिम्यावरही नाही.' सामान्य भाषेत लोक गाय-घोडे, हत्ती-सोने, दास-पत्नी, जमीन-घरे यांच्या रूपात महिम्याबद्दल बोलतात - पण मी असे म्हणत नाही, मी असे म्हणत नाही,' तो म्हणाला, 'कारण त्या स्थितीत एक वस्तू दुसऱ्यावर टिकलेली असते. पण हे वेगळे आहे.'