Beyond Delusion and Sorrow
यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः । तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥ ७ ॥
When, for the one who truly understands, all beings are seen as one's own Self — what delusion, what sorrow can remain for someone who perceives this unity?
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Beyond Delusion and Sorrow
यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः । तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥ ७ ॥
जिस ज्ञानी के लिए समस्त प्राणी आत्मा के ही रूप में प्रतीत होते हैं, उस एकत्व को देखने वाले को फिर कैसा मोह और कैसा शोक?
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Beyond Delusion and Sorrow
यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः । तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥ ७ ॥
ज्या ज्ञानी माणसाला सर्व प्राणी हे आत्म्याचेच रूप वाटतात, त्या एकत्व पाहणाऱ्याला मग कसला मोह आणि कसले दुःख?
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