Beyond Joy and Sorrow
तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम् । अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ॥ १२ ॥
Having recognized, through deep inward meditation, that god who is hard to see, deeply hidden, set in the cave of the heart, dwelling in the depths, ancient — the wise one leaves behind both joy and sorrow.
Beyond Joy and Sorrow
तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम् । अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ॥ १२ ॥
जो दुर्लभ रूप से दिखाई देने वाला, गहराई में छिपा, हृदय की गुहा में स्थित, प्राचीन देव है, उसे अध्यात्म-योग द्वारा जानकर धीर पुरुष हर्ष और शोक दोनों को त्याग देता है।
Beyond Joy and Sorrow
तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम् । अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ॥ १२ ॥
जो दुर्लभ रूपाने दिसणारा, खोलवर लपलेला, हृदयाच्या गुहेत स्थित, प्राचीन देव आहे, त्याला अध्यात्म-योगाने जाणून धीर पुरुष हर्ष आणि शोक दोन्ही त्यागतो.