Taijasa, the Dreaming Self
स्वप्नस्थानोऽन्तःप्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः प्रविविक्तभुक्तैजसो द्वितीयः पादः ॥ ४ ॥
The second quarter is Taijasa, whose realm is the dream state. He is aware of the inner world, has the same seven limbs and nineteen mouths, and enjoys subtle, refined objects.
Taijasa, the Dreaming Self
स्वप्नस्थानोऽन्तःप्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः प्रविविक्तभुक्तैजसो द्वितीयः पादः ॥ ४ ॥
द्वितीय पाद तैजस है, जिसका स्थान स्वप्न अवस्था है। वह अंतर्जगत को जानने वाला है, उसके भी वही सात अंग और उन्नीस मुख हैं, और वह सूक्ष्म, विशिष्ट पदार्थों का भोग करता है।
Taijasa, the Dreaming Self
स्वप्नस्थानोऽन्तःप्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः प्रविविक्तभुक्तैजसो द्वितीयः पादः ॥ ४ ॥
दुसरा पाद तैजस आहे, ज्याचे स्थान स्वप्नावस्था आहे. तो अंतर्जगताचे ज्ञान असणारा आहे, त्यालाही तीच सात अंगे आणि एकोणीस मुखे आहेत, आणि तो सूक्ष्म, विशिष्ट पदार्थांचा उपभोग घेतो.