Foremost Among Knowers of Brahman
प्राणो ह्येष यः सर्वभूतैर्विभाति विजानन् विद्वान् भवते नातिवादी । आत्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावानेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः ॥ ४ ॥
This indeed is the vital force shining through all beings; the wise one who realizes this has no need for empty argument. Delighting in the Self, rejoicing in the Self, actively absorbed within — such a one is the foremost among the knowers of Brahman.
Foremost Among Knowers of Brahman
प्राणो ह्येष यः सर्वभूतैर्विभाति विजानन् विद्वान् भवते नातिवादी । आत्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावानेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः ॥ ४ ॥
यही वह प्राणतत्व है, जो समस्त प्राणियों में प्रकाशित होता है; जो विद्वान इसे जानता है, वह व्यर्थ वाद-विवाद नहीं करता। आत्मा में क्रीड़ा करने वाला, आत्मा में ही रमण करने वाला, सक्रिय — वही ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ है।
Foremost Among Knowers of Brahman
प्राणो ह्येष यः सर्वभूतैर्विभाति विजानन् विद्वान् भवते नातिवादी । आत्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावानेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः ॥ ४ ॥
हेच ते प्राणतत्त्व आहे, जे सर्व प्राण्यांमध्ये प्रकाशित होते; जो विद्वान हे जाणतो, तो व्यर्थ वाद-विवाद करत नाही. आत्म्यात क्रीडा करणारा, आत्म्यातच रममाण होणारा, सक्रिय — तोच ब्रह्मज्ञान्यांमध्ये श्रेष्ठ आहे.