The Fires That Never Sleep
प्राणाग्नय एवैतस्मिन् पुरे जाग्रति । गार्हपत्यो ह वा एषोऽपानो व्यानोऽन्वाहार्यपचनो यद्गार्हपत्यात् प्रणीयते प्रणयनादाहवनीयः प्राणः ॥ ३ ॥
The fires of life-breath remain awake in this city of the body. The out-breath is like the household fire (garhapatya); the diffused breath is like the southern sacrificial fire; and the in-breath is like the offertory fire, since it is led forth from the household fire.
The Fires That Never Sleep
प्राणाग्नय एवैतस्मिन् पुरे जाग्रति । गार्हपत्यो ह वा एषोऽपानो व्यानोऽन्वाहार्यपचनो यद्गार्हपत्यात् प्रणीयते प्रणयनादाहवनीयः प्राणः ॥ ३ ॥
प्राण की अग्नियाँ इस शरीर रूपी नगर में सदा जागृत रहती हैं। अपान गार्हपत्य अग्नि के समान है; व्यान अन्वाहार्यपचन (दक्षिण) अग्नि के समान है; और प्राण आहवनीय अग्नि के समान है, क्योंकि वह गार्हपत्य से ही प्रणीत (आगे ले जाया गया) होता है।
The Fires That Never Sleep
प्राणाग्नय एवैतस्मिन् पुरे जाग्रति । गार्हपत्यो ह वा एषोऽपानो व्यानोऽन्वाहार्यपचनो यद्गार्हपत्यात् प्रणीयते प्रणयनादाहवनीयः प्राणः ॥ ३ ॥
प्राणाच्या अग्नी या शरीररूपी नगरात सदैव जागृत असतात. अपान गार्हपत्य अग्नीसमान आहे; व्यान अन्वाहार्यपचन (दक्षिण) अग्नीसमान आहे; आणि प्राण आहवनीय अग्नीसमान आहे, कारण तो गार्हपत्यातूनच प्रणीत (पुढे नेला) होतो.